
Historical Background FULL CHAPTER | Indian Polity Chapter 1 | UPSC Preparation ⚡
UPSC Wallah
Overview
यह वीडियो भारत के संविधान के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और इसके विकास पर केंद्रित है। यह बताता है कि कैसे यूरोपीय कंपनियां, विशेष रूप से ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी, भारत में व्यापार करने आईं और धीरे-धीरे राजनीतिक शक्ति हासिल की। वीडियो 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से शुरू होकर 1861 के इंडियन काउंसिल एक्ट तक विभिन्न महत्वपूर्ण अधिनियमों और घटनाओं की व्याख्या करता है, यह समझाते हुए कि कैसे इन अधिनियमों ने कंपनी के शासन और बाद में ब्रिटिश क्राउन के शासन के तहत भारत के प्रशासनिक और विधायी ढांचे को आकार दिया। इसमें प्रमुख अधिनियमों, उनके प्रावधानों और भारतीय शासन प्रणाली पर उनके प्रभाव पर प्रकाश डाला गया है।
Save this permanently with flashcards, quizzes, and AI chat
Chapters
- 1600 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को रॉयल चार्टर मिला, जिससे उन्हें भारत में व्यापार करने की अनुमति मिली।
- शुरुआत में, अंग्रेज, फ्रांसीसी, पुर्तगाली और डच जैसी यूरोपीय कंपनियां भारत में मसालों, कॉटन और इंडिगो जैसे सामानों के व्यापार के लिए आईं।
- 1757 और 1764 की लड़ाइयों के बाद, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने धीरे-धीरे अपना राजनीतिक और सैन्य प्रभुत्व स्थापित करना शुरू कर दिया।
- 1764 की बक्सर की लड़ाई के बाद, ईस्ट इंडिया कंपनी ने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय से बंगाल, बिहार और ओडिशा की दीवानी (राजस्व एकत्र करने का अधिकार) प्राप्त की।
- दीवानी मिलने से कंपनी की आर्थिक और राजनीतिक पकड़ मजबूत हुई, जिससे वे केवल व्यापार से आगे बढ़कर शासन में शामिल हो गए।
- कंपनी ने अन्य यूरोपीय शक्तियों जैसे फ्रांसीसियों के साथ संघर्ष किया और बॉम्बे जैसे क्षेत्रों को दहेज में प्राप्त किया।
- 1773 का रेगुलेटिंग एक्ट ब्रिटिश सरकार द्वारा कंपनी के बेलगाम कामकाज को नियंत्रित करने का पहला प्रयास था।
- इस एक्ट ने गवर्नर ऑफ बंगाल को गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल बनाया और बॉम्बे व मद्रास के गवर्नरों को उसके अधीन कर दिया।
- 1781 के एक्ट ऑफ सेटलमेंट ने सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को सीमित किया, राजस्व मामलों को उसके दायरे से बाहर रखा और गवर्नर जनरल व उसके काउंसिल को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए छूट दी।
- पिट्स इंडिया एक्ट 1784 ने कंपनी के राजनीतिक और वाणिज्यिक कार्यों को अलग कर दिया, एक नया निकाय 'बोर्ड ऑफ कंट्रोल' स्थापित किया जो राजनीतिक मामलों की देखरेख करता था, जबकि 'कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स' वाणिज्यिक मामलों को देखते थे।
- इस एक्ट ने भारत में कंपनी के क्षेत्रों को 'ब्रिटिश पज़ेशन्स इन इंडिया' के रूप में मान्यता दी, जिससे ब्रिटिश सरकार का कंपनी पर सीधा नियंत्रण बढ़ गया।
- 1786 के एक्ट ने लॉर्ड कॉर्नवालिस को गवर्नर जनरल के रूप में नियुक्त किया और उन्हें अपनी काउंसिल के निर्णयों को ओवरराइड करने की विशेष शक्ति दी, साथ ही कमांडर-इन-चीफ का पद भी प्रदान किया।
- 1793 के चार्टर एक्ट ने कंपनी के एकाधिकार को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ाया और बोर्ड ऑफ कंट्रोल के खर्चों को भारतीय राजस्व से वहन करने का प्रावधान किया।
- 1813 के चार्टर एक्ट ने कंपनी के व्यापारिक एकाधिकार को समाप्त कर दिया, सिवाय चाय व्यापार और चीन के साथ व्यापार के, और भारत में पश्चिमी शिक्षा और ईसाई मिशनरियों के प्रसार की अनुमति दी।
- 1833 के चार्टर एक्ट ने गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल को गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया बनाया, जिससे भारत में केंद्रीकृत शासन की नींव पड़ी और कंपनी की वाणिज्यिक गतिविधियों को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया।
- 1853 के चार्टर एक्ट ने सिविल सेवाओं में खुली प्रतियोगिता की शुरुआत की, जिससे भारतीयों के लिए आईसीएस परीक्षा में भाग लेना संभव हुआ।
- इस एक्ट ने गवर्नर जनरल की काउंसिल के विधायी और कार्यकारी कार्यों को अलग कर दिया, जिससे एक अलग विधायी परिषद का गठन हुआ।
- 1857 के विद्रोह के बाद, 1858 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट पारित हुआ, जिसने कंपनी के शासन को समाप्त कर दिया और भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन कर दिया।
- 1858 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट ने ईस्ट इंडिया कंपनी को समाप्त कर दिया और भारत का शासन ब्रिटिश क्राउन के सीधे नियंत्रण में ला दिया।
- गवर्नर जनरल ऑफ इंडिया का पद बदलकर वाइसरॉय कर दिया गया, जो सीधे ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधि होता था, और लॉर्ड कैनिंग पहले वाइसरॉय बने।
- एक नए पद 'सेक्रेटरी ऑफ स्टेट फॉर इंडिया' का सृजन किया गया, जो लंदन में रहकर भारतीय प्रशासन की देखरेख करता था, और उसकी सहायता के लिए 15 सदस्यीय काउंसिल ऑफ इंडिया का गठन किया गया।
- 1861 के भारतीय परिषद अधिनियम ने कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीयों को शामिल करने की शुरुआत की, हालांकि गैर-सरकारी सदस्यों के रूप में।
- वाइसरॉय की विस्तारित परिषद में तीन भारतीय - बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और सर दिनकर राव - को गैर-सरकारी सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया।
- इस अधिनियम ने बंगाल, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और पंजाब के लिए नई विधायी परिषदों की स्थापना की और मद्रास व बॉम्बे प्रेसीडेंसी की विधायी शक्तियों को बहाल किया।
Key takeaways
- ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का भारत में आगमन केवल व्यापार के उद्देश्य से हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने राजनीतिक शक्ति हासिल कर ली।
- 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट से लेकर 1858 के गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट तक, ब्रिटिश संसद ने कंपनी के शासन को नियंत्रित करने और अंततः समाप्त करने के लिए कई अधिनियम पारित किए।
- कंपनी के शासन के दौरान, अधिनियमों ने धीरे-धीरे भारत में एक केंद्रीकृत प्रशासन की स्थापना की और ब्रिटिश सरकार का नियंत्रण बढ़ाया।
- 1857 के विद्रोह के बाद, भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन आ गया, जिसने भारत के संवैधानिक इतिहास में एक नया अध्याय खोला।
- भारतीय परिषद अधिनियम 1861 ने भारतीयों को कानून बनाने की प्रक्रिया में शामिल करके प्रतिनिधित्व की शुरुआत की, भले ही यह सीमित था।
- समय के साथ, अधिनियमों ने विधायी शक्तियों का विस्तार किया और स्थानीय सरकारों को अधिक स्वायत्तता प्रदान की।
Key terms
Test your understanding
- 1764 की बक्सर की लड़ाई के बाद ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कौन से अधिकार प्राप्त किए और इसका क्या महत्व था?
- 1773 के रेगुलेटिंग एक्ट के मुख्य प्रावधान क्या थे और इसने भारत में प्रशासन को कैसे प्रभावित किया?
- पिट्स इंडिया एक्ट 1784 ने कंपनी के शासन में क्या बदलाव लाए और क्यों?
- 1833 के चार्टर एक्ट ने गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल के पद को कैसे बदला और इसके क्या परिणाम हुए?
- 1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटिश क्राउन ने भारत का शासन सीधे अपने हाथ में क्यों लिया और इसके लिए कौन सा अधिनियम पारित किया गया?