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गोंडवाना के प्रथम शंभु कोसोंडूम बाबा और मुलादाई विवाह | कोया पुनेम गोंडी गाथा | शंकर शाह इरपाची |
Koytur Jan gondvana
Overview
यह वीडियो गोंडवाना के प्रथम शंभू, कोसोंडूम बाबा, और उनकी पत्नी मूलादाई के विवाह की गाथा का वर्णन करता है। यह बताता है कि कैसे कोसोंडूम ने प्रकृति का गहन अध्ययन करके 'शंभू' का पद प्राप्त किया और फिर मेलकोट गणराज्य की राजकुमारी मूलादाई से उनका विवाह हुआ। वीडियो गोंड विवाह की प्राचीन परंपराओं, जैसे हल्दी लगाना, तेल चढ़ाना, बारात की तैयारी, और विवाह के दौरान गाए जाने वाले गीतों पर प्रकाश डालता है। यह आधुनिक रीति-रिवाजों के साथ पारंपरिक प्रथाओं के बदलाव को भी दर्शाता है और गोंड समाज की सांस्कृतिक विरासत को समझने का प्रयास करता है।
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Chapters
- शंभू का पद 88 पीढ़ियों तक चला, और प्रथम शंभू कोसोंडूम थे।
- कोसोंडूम का जन्म जयंत और कुलीतरा से हुआ था, और उनका असली नाम कोसोडूम था।
- शंभू का अर्थ है 'पांच खंड धरती का स्वामी', जो चुनाव से नहीं, बल्कि ज्ञान और प्रकृति के अध्ययन से प्राप्त होता था।
- गोंड समाज में चुनाव नहीं होते थे, जिससे समाज टूटता नहीं था; संगठित समाज रीति-रिवाजों पर चलती है।
यह खंड बताता है कि 'शंभू' का पद कैसे प्राप्त होता था और यह पदधारी कौन थे, जो गोंड समाज की नेतृत्व संरचना को समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
कोसोंडूम ने प्रकृति का अध्ययन किया, जिसमें 52 लाख वनस्पति और 12 लाख झाड़ों के बारे में जाना, और यह समझा कि जीव चार प्रकार से उत्पन्न होते हैं: अंडज, पिंडज, श्वेदज, और रुधिभज।
- कोसोंडूम ने प्रकृति, धातु, तत्व और संचालन शक्तियों (दाऊ-दाई) का गहन अध्ययन किया।
- इस अध्ययन को 'अखंड साधना' कहा गया, जिससे उन्हें दिव्य ज्ञान प्राप्त हुआ।
- ज्ञान के कारण कोसोंडूम 'त्रिकालदर्शी' बन गए, जिसे बाद में तीन आंखों वाले देवता के रूप में चित्रित किया गया।
- समस्त जीव-प्राणियों ने मिलकर कोसोंडूम को पांच खंड धरती (भारत, अरब, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका) का मालिक बनाया।
यह खंड दर्शाता है कि कैसे ज्ञान और प्रकृति की समझ से नेतृत्व का पद प्राप्त होता था, जो आज के ज्ञान-आधारित समाज के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है।
कोसोंडूम को त्रिकालदर्शी माना जाने लगा, इसलिए चित्रकारों ने उनकी तीन आंखों वाली छवि बनाई, हालांकि उनकी दो ही आंखें थीं।
- शंभू के माता-पिता ने उनके विवाह के लिए मेलकोट गणराज्य के राजा डोम की पुत्री मूलादाई को चुना।
- पहले दूल्हा की बारात दुल्हन के घर नहीं जाती थी, बल्कि दुल्हन दूल्हा के घर आती थी, क्योंकि दुल्हन दूल्हा पक्ष के देवी-देवताओं को अपनाती थी।
- विवाह से पहले 'मांगेर माटी' (चिकनी मिट्टी) लाने की प्रथा थी, जिससे दुल्हन का सिर धोया जाता था।
यह खंड गोंड विवाह की प्रारंभिक परंपराओं और सामाजिक व्यवस्था को समझने में मदद करता है, जिसमें परिवार की भूमिका और रीति-रिवाजों का महत्व बताया गया है।
दूल्हन के सिर धोने के लिए चिकनी मिट्टी लाई जाती थी, जिसे बाद में चूल्हा बनाने में भी इस्तेमाल किया जाने लगा।
- हल्दी लगाने की रस्म नौ दिन से शुरू होकर धीरे-धीरे एक दिन तक सीमित हो गई।
- हल्दी को दवा माना जाता था, जो चर्म रोगों को ठीक करती थी और शरीर को मजबूत बनाती थी।
- तेल चढ़ाते समय महिलाएं विशेष गीत गाती थीं, जिन्हें 'बनन्ना' (दूल्हा के लिए) या 'बन्नी' (दुल्हन के लिए) कहा जाता था।
यह खंड हल्दी और तेल चढ़ाने जैसी रस्मों के पीछे के औषधीय और सांस्कृतिक महत्व को उजागर करता है, जो स्वास्थ्य और सौंदर्य से जुड़े थे।
हल्दी को सात दिन तक लगाने से चर्म रोग ठीक हो जाते थे और शरीर मजबूत होता था, जिससे संतान उत्पत्ति में आसानी होती थी।
- बारात बैल, भैंसा और हाथी जैसे पारंपरिक वाहनों पर निकलती थी, जिसमें खाने के लिए रोटी-नमक ले जाया जाता था।
- बारातियों को रास्ते में प्यास लगी, तो मूलादाई ने नागराज का ध्यान करके और तंदरी योग लगाकर जल प्रकट किया।
- इस स्थान को 'मूलापी' कहा गया, जो आज 'मुलताई' के नाम से जाना जाता है।
यह खंड मूलादाई की अलौकिक शक्ति को दर्शाता है और बताता है कि कैसे एक महत्वपूर्ण स्थान का नामकरण उनकी तपस्या से जुड़ा है।
मूलादाई ने बामी (बिल) में बैठकर नागराज का ध्यान किया और तंदरी योग लगाकर जल प्रकट किया, जिससे प्यासे बारातियों की प्यास बुझी।
- मूलादाई के आंसू एक कुंड में गिरे, जिससे पानी गर्म हो गया और उसे 'कनकनांड धारा' (आंखों का आंसू) कहा गया, जो आज 'कान्हा नदी' के नाम से जानी जाती है।
- विवाह के मंडप (मढ़ा) के नीचे खाना खिलाया जाता था, और गीत गाए जाते थे जो मड़वा की संरचना का वर्णन करते थे।
- गोंड विवाह में दहेज नहीं था, बल्कि नव-विवाहित जोड़े को सहयोग के रूप में अनाज, बैल, बर्तन आदि दिए जाते थे, जिसे 'दान' नहीं, 'सहयोग' कहा जाता था।
यह खंड विवाह की अन्य महत्वपूर्ण रस्मों और सामाजिक व्यवस्थाओं को स्पष्ट करता है, जैसे कि सहयोग की परंपरा और मड़वा गीत का अर्थ।
मूलादाई के आंसू से बना गर्म कुंड आज भी महादेव चौरागढ़ के पास मौजूद है, जिसे 'अनहोनी' या 'गरम कुंड' कहा जाता है और जिसके पानी से चर्म रोग ठीक होते हैं।
- भूमका (बैगा) दूल्हा-दुल्हन को जीवन भर साथ रहने, देवी-देवताओं को महुआ का फूल चढ़ाने और शराब न पीने का संकल्प कराते थे।
- गोंड विवाह में भवरा (परिक्रमा) दाएं से बाएं (प्रकृति के नियम अनुसार) होता था।
- आधुनिक समाज में दहेज की प्रथा ने सहयोग की परंपरा को बिगाड़ दिया है, जिसे सामाजिक बैठकों द्वारा सुधारा जा सकता है।
यह खंड विवाह के नैतिक और आध्यात्मिक पहलुओं पर जोर देता है, जैसे कि संकल्प और प्रकृति के नियमों का पालन, जो समाज को मजबूत बनाते हैं।
भूमका दूल्हा-दुल्हन से सात वचन लेते थे, जिसमें एक था कि वे कभी शराब नहीं पिएंगे और न ही देवी-देवताओं को चढ़ाएंगे, क्योंकि गोंड समाज में महुआ का फूल चढ़ता था, शराब नहीं।
Key takeaways
- गोंड समाज में नेतृत्व ज्ञान और प्रकृति के गहन अध्ययन पर आधारित था, न कि चुनाव पर।
- पारंपरिक विवाह रस्में जैसे हल्दी और तेल चढ़ाना स्वास्थ्य और कल्याण के लिए महत्वपूर्ण थे।
- मूलादाई ने अपनी तपस्या और शक्ति से जल प्रकट किया, जो प्राकृतिक आपदाओं से निपटने की क्षमता को दर्शाता है।
- गोंड समाज में सहयोग की भावना थी, जिसे आज की दहेज प्रथा से बदलने की आवश्यकता है।
- सामाजिक व्यवस्था को बनाए रखने के लिए गुरु (भूमका/बैगा) का चरित्र महत्वपूर्ण है; वे स्वयं शराब न पीकर समाज को सही दिशा दिखाएं।
- प्रकृति के नियमों (जैसे दाएं से बाएं परिक्रमा) का पालन सामाजिक और व्यक्तिगत विकास के लिए आवश्यक है।
Key terms
शंभूकोसोंडूममूलादाईकोया पुनेमगोंडी गाथाजयंतकुलीतरात्रिकालदर्शीमांगेर माटीबनन्ना/बन्नीतंदरी योगमूलापी/मुलताईकनकनांड धारामढ़ाभवराभूमका/बैगा
Test your understanding
- शंभू का पद गोंड समाज में कैसे प्राप्त किया जाता था और इसका क्या अर्थ था?
- कोसोंडूम ने प्रकृति का अध्ययन करके क्या सीखा और इससे उन्हें क्या ज्ञान प्राप्त हुआ?
- मूलादाई ने बारात के प्यासे होने पर जल कैसे प्रकट किया और उस स्थान का क्या महत्व है?
- गोंड विवाह में हल्दी और तेल चढ़ाने की रस्मों के पीछे क्या कारण थे?
- गोंड समाज में दहेज की प्रथा के बजाय किस प्रकार की सहयोग प्रणाली थी और आज उसमें क्या बदलाव आया है?