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How to do Audit? |Practical Knowledge of Audit | How to do Audit in real life| Audit Kaise Karte Hai
Pathak Tutorials
Overview
यह वीडियो ऑडिटिंग की प्रैक्टिकल प्रक्रिया को समझने में मदद करती है, खासकर स्टेट्यूटरी ऑडिट पर ध्यान केंद्रित करते हुए। इसमें ओपनिंग बैलेंस की जांच, वाउचिंग, जीएसटी और टीडीएस रिकंसीलिएशन, लेजर स्क्रूटनी, प्रोविजन और प्रीपेड एक्सपेंसेस की समझ, ड्राफ्ट बैलेंस शीट तैयार करना और इंटरनल ऑडिट के बीच अंतर जैसी महत्वपूर्ण बातों को शामिल किया गया है। वीडियो का उद्देश्य ऑडिटिंग की शुरुआत से अंत तक की पूरी प्रक्रिया को व्यावहारिक उदाहरणों के साथ समझाना है ताकि लर्नर्स को रियल-लाइफ ऑडिटिंग की अच्छी समझ हो सके।
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Chapters
- ऑडिटिंग की प्रैक्टिकल नॉलेज को शुरुआत से अंत तक समझाया जाएगा।
- स्टेट्यूटरी ऑडिट पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
- ऑडिट का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम ओपनिंग बैलेंस की जांच करना है।
- ओपनिंग बैलेंस की जांच यह सुनिश्चित करती है कि पिछले साल के क्लोजिंग बैलेंस सही ढंग से करंट ईयर में कैरी फॉरवर्ड हुए हैं।
ओपनिंग बैलेंस की सही जांच यह सुनिश्चित करती है कि वित्तीय विवरणों की नींव मजबूत है, जिससे करंट ईयर की बैलेंस शीट की सटीकता बनी रहती है।
यदि पिछले साल के देनदारों (debtors) का बैलेंस 2 करोड़ था, तो यह जांचना कि क्या वही 2 करोड़ करंट ईयर में कैरी फॉरवर्ड हुआ है।
- वाउचिंग में सभी ट्रांजैक्शन्स (खरीद, बिक्री, खर्च) के सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट्स (जैसे बिल) की जांच की जाती है।
- यह सुनिश्चित किया जाता है कि एसेट्स की खरीद को परचेज बुक में शामिल न किया जाए, बल्कि उसके लिए अलग फाइल बनाई जाए।
- खर्चों की जांच करते समय टीडीएस (TDS) की एप्लीकेबिलिटी और उसके डिडक्शन की जांच की जाती है।
- बिजनेस के नेचर के अनुसार ही आइटम्स को परचेज बुक में शामिल किया जाना चाहिए।
वाउचिंग से यह पुष्टि होती है कि रिकॉर्ड किए गए सभी ट्रांजैक्शन्स वास्तविक और उचित हैं, जिससे वित्तीय विवरणों में विश्वास बढ़ता है।
यदि कंपनी का बिजनेस टेलीविजन बेचने का है, तो बेचने के लिए खरीदे गए टेलीविजन परचेज बुक में जाएंगे, लेकिन ऑफिस के इस्तेमाल के लिए खरीदे गए टेलीविजन को एसेट माना जाएगा।
- जीएसटी रिटर्न (जैसे GSTR-1, GSTR-3B) को कंपनी के बुक्स ऑफ अकाउंट्स से रिकंसाइल किया जाता है।
- इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के सही क्लेम और आउटपुट टैक्स के सही फाइलिंग की जांच की जाती है।
- टीडीएस (TDS) और टीसीएस (TCS) के डिडक्शन और पेमेंट को संबंधित रिटर्न्स से मैच किया जाता है।
- किसी भी अंतर (difference) के कारणों का पता लगाया जाता है और उसे ठीक किया जाता है।
जीएसटी और टीडीएस रिकंसीलिएशन यह सुनिश्चित करता है कि कंपनी सभी टैक्स नियमों का पालन कर रही है और किसी भी टैक्स देनदारी या क्रेडिट में कोई विसंगति नहीं है।
GSTR-1 में दिखाई गई सेल्स को कंपनी के सेल्स लेजर से मैच करना और GSTR-3B में क्लेम किए गए इनपुट टैक्स क्रेडिट को परचेज लेजर से मिलाना।
- ट्रायल बैलेंस के सभी लेजर्स (जैसे एक्सपेंस, इनकम, एसेट्स, लायबिलिटीज) की विस्तार से जांच की जाती है।
- यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी एक्सपेंसेस पर लागू टीडीएस काटा गया है और इनकम पर टीडीएस सही ढंग से रिपोर्ट हुआ है।
- प्रोविजन (जैसे प्रोविजन फॉर एक्सपेंसेस) की जांच की जाती है कि वे उचित हैं और पिछले साल के प्रोविजन रिवर्ट हुए हैं या नहीं।
- प्रीपेड एक्सपेंसेस (जैसे प्रीपेड इंश्योरेंस) को सही ढंग से पहचाना और वैल्यू किया जाता है।
लेजर स्क्रूटनी और प्रोविजन की जांच से वित्तीय विवरणों की सटीकता सुनिश्चित होती है और यह पता चलता है कि क्या कोई गलत या दिखावटी खर्च दर्ज किया गया है।
मार्च महीने के इलेक्ट्रिसिटी बिल का भुगतान अप्रैल में होने पर, उसे फाइनेंशियल स्टेटमेंट में 'प्रोविजन फॉर इलेक्ट्रिसिटी एक्सपेंस' के रूप में दर्ज करना और अगले साल उसे रिवर्ट करना।
- फिक्स्ड एसेट्स की फिजिकल वेरिफिकेशन और उनके बिलों की जांच की जाती है।
- देनदारों (Creditors) और लेनदारों (Debtors) की एजिंग (Aging) की जाती है ताकि लंबे समय से पेंडिंग आइटम्स का पता चल सके।
- लोन और कैपिटल में हुए किसी भी एडिशन की जांच की जाती है।
- करंट ईयर की ड्राफ्ट बैलेंस शीट तैयार की जाती है और उसकी तुलना पिछले साल के फिगर्स से की जाती है।
एसेट्स और लायबिलिटीज की सही जांच और ड्राफ्ट बैलेंस शीट की तुलना से कंपनी की वित्तीय स्थिति का स्पष्ट चित्र मिलता है और महत्वपूर्ण विसंगतियों को पहचाना जा सकता है।
यह जांचना कि क्या 6 महीने से अधिक समय से किसी देनदार से पेमेंट नहीं आई है, और यदि हां, तो उसके कारणों का पता लगाना।
- इंटरनल ऑडिट कंपनी के आंतरिक प्रक्रियाओं और कंट्रोल्स की जांच करता है।
- स्टेट्यूटरी ऑडिट बाहरी नियमों और कानूनों के अनुसार वित्तीय विवरणों की जांच करता है।
- इंटरनल ऑडिट का उद्देश्य कंपनी के संचालन में सुधार करना होता है, जबकि स्टेट्यूटरी ऑडिट का उद्देश्य वित्तीय विवरणों की सत्यता पर राय देना होता है।
- कुछ बड़ी कंपनियों के लिए इंटरनल ऑडिट अनिवार्य होता है, जबकि स्टेट्यूटरी ऑडिट सभी के लिए होता है।
इंटरनल और स्टेट्यूटरी ऑडिट के बीच अंतर को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों के उद्देश्य, दायरे और रिपोर्टिंग अलग-अलग होती है, जो कंपनी के समग्र शासन के लिए आवश्यक हैं।
इंटरनल ऑडिटर यह जांच सकता है कि परचेज डिपार्टमेंट में अप्रूवल प्रोसेस सही है या नहीं, जबकि स्टेट्यूटरी ऑडिटर यह जांचेगा कि परचेज ट्रांजैक्शन्स सही ढंग से रिकॉर्ड हुए हैं या नहीं।
Key takeaways
- ऑडिटिंग की शुरुआत हमेशा ओपनिंग बैलेंस की सटीकता सुनिश्चित करने से होती है।
- वाउचिंग के बिना कोई भी ट्रांजैक्शन मान्य नहीं है; हर एंट्री के पीछे सपोर्टिंग डॉक्यूमेंट होना चाहिए।
- जीएसटी और टीडीएस रिकंसीलिएशन टैक्स कंप्लायंस के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- लेजर स्क्रूटनी से सभी वित्तीय मदों की गहराई से जांच होती है, जिससे गलतियों का पता चलता है।
- प्रोविजन और प्रीपेड एक्सपेंसेस का सही ट्रीटमेंट वित्तीय विवरणों को सटीक बनाता है।
- ड्राफ्ट बैलेंस शीट की तुलना पिछले साल के फिगर्स से करना महत्वपूर्ण विसंगतियों को उजागर करता है।
- इंटरनल ऑडिट कंपनी के आंतरिक कंट्रोल्स को मजबूत करता है, जबकि स्टेट्यूटरी ऑडिट बाहरी विश्वसनीयता प्रदान करता है।
Key terms
Statutory AuditOpening BalanceVouchingPerks BookTDS (Tax Deducted at Source)GST (Goods and Services Tax)ReconciliationLedger ScrutinyProvisionPrepaid ExpensesDraft Balance SheetInternal Audit
Test your understanding
- ऑडिट प्रक्रिया में ओपनिंग बैलेंस की जांच क्यों महत्वपूर्ण है और इसे कैसे किया जाता है?
- वाउचिंग के दौरान किन मुख्य बातों का ध्यान रखना चाहिए, खासकर एसेट्स की खरीद और खर्चों के संबंध में?
- जीएसटी और टीडीएस रिकंसीलिएशन में किन प्रमुख आइटम्स की तुलना की जाती है और विसंगतियों को कैसे संभाला जाता है?
- लेजर स्क्रूटनी के दौरान किन प्रकार की गलतियों या अनियमितताओं का पता लगाया जा सकता है?
- इंटरनल ऑडिट और स्टेट्यूटरी ऑडिट के बीच मुख्य अंतर क्या हैं और उनके उद्देश्य क्या हैं?