Banking Awareness Complete Course for All Exams| Class- 15 | NEGOTIABLE INSTRUMENTS | By Sheetal Mam
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Banking Awareness Complete Course for All Exams| Class- 15 | NEGOTIABLE INSTRUMENTS | By Sheetal Mam

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7 chapters5 takeaways13 key terms5 questions

Overview

यह वीडियो बैंकिंग परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण 'परक्राम्य लिखत अधिनियम' (Negotiable Instruments Act) पर केंद्रित है। इसमें परक्राम्य लिखतों की अवधारणा, उनके प्रकार जैसे प्रॉमिसरी नोट, बिल ऑफ एक्सचेंज और चेक, और उनसे संबंधित महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधानों को समझाया गया है। वीडियो का उद्देश्य छात्रों को इन वित्तीय साधनों की कार्यप्रणाली और बैंकिंग क्षेत्र में उनके महत्व को स्पष्ट करना है। यह विभिन्न परीक्षाओं के लिए एक विस्तृत अध्ययन गाइड के रूप में कार्य करता है।

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Chapters

  • परक्राम्य लिखत का अर्थ है ऐसी वित्तीय लिखत जो आसानी से हस्तांतरणीय हो, यानी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को दी जा सके।
  • यह शब्द 'नेगोशिएट' से आया है, जिसका मतलब मोलभाव या समझौता करना होता है, जो इन लिखतों की प्रकृति को दर्शाता है।
  • परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) इन लिखतों को नियंत्रित करता है।
  • यह अधिनियम भारत में वित्तीय लेनदेन को विनियमित करने के लिए बनाया गया था।
परक्राम्य लिखतों को समझना बैंकिंग और वित्तीय लेनदेन की नींव को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि ये भुगतान और ऋण के लिए उपयोग किए जाने वाले प्राथमिक साधन हैं।
जैसे आम खरीदते समय मोलभाव करना, उसी तरह परक्राम्य लिखत भी दो पक्षों के बीच एक समझौते का प्रतिनिधित्व करते हैं।
  • परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) के तहत मुख्य रूप से तीन प्रकार की परक्राम्य लिखतें हैं: प्रॉमिसरी नोट, बिल ऑफ एक्सचेंज और चेक।
  • प्रॉमिसरी नोट (Promissory Note) एक लिखित वादा होता है जिसमें एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को एक निश्चित राशि का भुगतान करने का वचन देता है। इसमें दो पक्ष होते हैं।
  • बिल ऑफ एक्सचेंज (Bill of Exchange) एक लिखित आदेश होता है जिसमें एक व्यक्ति (ड्रॉयर) दूसरे व्यक्ति (ड्रॉई) को किसी तीसरे व्यक्ति (पेई) को एक निश्चित राशि का भुगतान करने का आदेश देता है। इसमें आमतौर पर तीन पक्ष होते हैं।
  • चेक (Cheque) बिल ऑफ एक्सचेंज का ही एक प्रकार है, जो बैंक को जारी किया जाता है और जिसमें बैंक को एक निश्चित राशि का भुगतान करने का आदेश होता है। इसमें भी तीन पक्ष होते हैं।
इन विभिन्न प्रकार की लिखतों को जानने से यह समझने में मदद मिलती है कि विभिन्न वित्तीय स्थितियों में भुगतान कैसे किया जाता है और कौन से पक्ष इसमें शामिल होते हैं।
प्रॉमिसरी नोट का उदाहरण: राम मोहन को एक लिखित वादा देता है कि वह अगस्त 2025 तक उसे ₹5 लाख का भुगतान करेगा।
  • प्रॉमिसरी नोट एक अनकंडीशनल लिखित वादा है, जो हस्ताक्षरित होना चाहिए।
  • इसमें दो पक्ष होते हैं: मेकर (जो वादा करता है) और पेई (जिसे भुगतान किया जाना है)।
  • यह एक निश्चित राशि का भुगतान एक निश्चित तिथि पर या मांग पर करने का वादा करता है।
  • प्रॉमिसरी नोट परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 4 के तहत परिभाषित है।
प्रॉमिसरी नोट व्यक्तिगत ऋणों और छोटे व्यवसायों के लिए एक महत्वपूर्ण साधन है, जो भुगतान के एक लिखित वादे के रूप में कार्य करता है।
राम, घनश्याम के बेटे के रूप में, मोहन को या उसके वाहक (bearer) को ₹5 लाख का भुगतान करने का वादा करता है, जो अगस्त 2025 में देय होगा।
  • बिल ऑफ एक्सचेंज एक अनकंडीशनल लिखित आदेश है, जो हस्ताक्षरित होना चाहिए।
  • इसमें तीन पक्ष होते हैं: ड्रॉयर (आदेश देने वाला), ड्रॉई (जिसे आदेश दिया गया है) और पेई (जिसे भुगतान प्राप्त होगा)।
  • ड्रॉयर, ड्रॉई को पेई को एक निश्चित राशि का भुगतान करने का आदेश देता है।
  • यह परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 5 के तहत परिभाषित है।
बिल ऑफ एक्सचेंज व्यापारिक लेनदेन में विशेष रूप से उपयोगी है, जहां यह उधार पर माल की बिक्री में भुगतान की गारंटी के रूप में कार्य करता है।
मोहन, राम को आदेश देता है कि वह ₹5 लाख का भुगतान सोहन को करे, जो मोहन का पैसा राम के पास पड़ा है।
  • चेक बिल ऑफ एक्सचेंज का एक प्रकार है, जो हमेशा एक बैंक को संबोधित होता है।
  • इसमें तीन पक्ष होते हैं: ड्रॉयर (खाताधारक), ड्रॉई (बैंक) और पेई (जिसे भुगतान किया जाना है)।
  • चेक एक निश्चित राशि के भुगतान का आदेश देता है, जिसे बैंक को ड्रॉई के रूप में भुगतान करना होता है।
  • चेक परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 6 के तहत परिभाषित है।
चेक सबसे आम परक्राम्य लिखतों में से एक है, जो व्यक्तियों और व्यवसायों के लिए भुगतान का एक सुविधाजनक और सुरक्षित तरीका प्रदान करता है।
राम, अपने बैंक (ड्रॉई) को मोहन (पेई) को ₹5 लाख का भुगतान करने का आदेश देते हुए एक चेक जारी करता है।
  • चेक एक पोस्ट-पेड साधन है, जिसका अर्थ है कि भुगतान बाद में किया जाता है और यह बैंक में पर्याप्त शेष राशि पर निर्भर करता है।
  • डिमांड ड्राफ्ट (DD) एक प्रीपेड साधन है, जहाँ भुगतानकर्ता (राम) बैंक को अग्रिम भुगतान करता है, और बैंक डीडी जारी करता है।
  • डीडी चेक बाउंस होने के जोखिम को समाप्त करता है क्योंकि भुगतान पहले ही बैंक को कर दिया जाता है।
  • डीडी को आमतौर पर धारा 85A के तहत माना जाता है, हालांकि यह सीधे तौर पर अधिनियम में परिभाषित नहीं है, बल्कि इसके उपयोग और प्रकृति को समझा जाता है।
डीडी उन स्थितियों में एक विश्वसनीय भुगतान विकल्प प्रदान करता है जहाँ चेक बाउंस होने का जोखिम होता है या जहाँ भुगतान की तत्काल गारंटी की आवश्यकता होती है।
राम को मोहन को ₹5 लाख का भुगतान करना है; मोहन केवल डीडी स्वीकार करता है, इसलिए राम बैंक को ₹5 लाख नकद देता है और बैंक राम के नाम पर एक डीडी जारी करता है।
  • धारा 13: परक्राम्य लिखतों की परिभाषा।
  • धारा 4, 5, 6: क्रमशः प्रॉमिसरी नोट, बिल ऑफ एक्सचेंज और चेक को परिभाषित करती हैं।
  • धारा 25: बैंक छुट्टियों (Bank Holidays) से संबंधित है। यदि मैच्योरिटी की तारीख बैंक छुट्टी पर पड़ती है, तो भुगतान अगले कार्य दिवस पर किया जाएगा।
  • धारा 31: बैंक का दायित्व है कि यदि खाते में पर्याप्त शेष राशि हो तो वह चेक का भुगतान करे।
  • धारा 138: चेक के अनादरण (Dishonour of Cheque) से संबंधित दंड का प्रावधान करती है, जैसे अपर्याप्त शेष राशि।
ये धाराएँ परक्राम्य लिखतों से संबंधित कानूनी ढांचे को स्थापित करती हैं, जिससे लेनदेन में स्पष्टता, सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित होती है।
यदि किसी बिल ऑफ एक्सचेंज की मैच्योरिटी डेट रविवार को पड़ती है, तो उसका भुगतान सोमवार को किया जाएगा (धारा 25)।

Key takeaways

  1. 1परक्राम्य लिखत वे वित्तीय साधन हैं जो आसानी से हस्तांतरणीय होते हैं और भुगतान के लिए उपयोग किए जाते हैं।
  2. 2प्रॉमिसरी नोट, बिल ऑफ एक्सचेंज और चेक परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 के तहत मुख्य प्रकार हैं।
  3. 3प्रॉमिसरी नोट में दो पक्ष होते हैं (मेकर और पेई), जबकि बिल ऑफ एक्सचेंज और चेक में आमतौर पर तीन पक्ष होते हैं।
  4. 4चेक एक बैंक को जारी किया गया बिल ऑफ एक्सचेंज है, जबकि डीडी एक प्रीपेड साधन है जो चेक बाउंस के जोखिम को कम करता है।
  5. 5परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 इन लिखतों के उपयोग, वैधता और अनादरण से संबंधित कानूनी प्रावधान प्रदान करता है।

Key terms

Negotiable InstrumentPromissory NoteBill of ExchangeChequeDrawerDraweePayeeMakerBearerOrderDishonour of ChequeDemand Draft (DD)Negotiable Instruments Act, 1881

Test your understanding

  1. 1परक्राम्य लिखत क्या है और यह सामान्य वित्तीय लेनदेन से कैसे भिन्न है?
  2. 2प्रॉमिसरी नोट और बिल ऑफ एक्सचेंज के बीच मुख्य अंतर क्या हैं, विशेष रूप से पक्षों की संख्या के संदर्भ में?
  3. 3चेक को बिल ऑफ एक्सचेंज का एक प्रकार क्यों माना जाता है, और बैंक की भूमिका इसमें क्या होती है?
  4. 4डिमांड ड्राफ्ट (DD) चेक से कैसे अलग है, और किन परिस्थितियों में डीडी का उपयोग करना बेहतर होता है?
  5. 5परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के तहत चेक के अनादरण (Dishonour) के क्या परिणाम हो सकते हैं?

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