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What was Pune Like in the Prehistoric Era? | Story of Pune I Ft. Brewkenstein
The Subculture
Overview
यह वीडियो पुणे शहर के प्रागैतिहासिक काल से लेकर मध्ययुगीन काल तक के इतिहास की पड़ताल करता है। यह बताता है कि कैसे पुणे, जो कभी शिकारियों और संग्राहकों का निवास स्थान था, एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और आध्यात्मिक केंद्र बन गया। वीडियो में विभिन्न राजवंशों, जैसे राष्ट्रकूट, चालुक्य और यादवों के शासनकाल का उल्लेख है, और यह भी बताता है कि कैसे शहर का नाम और पहचान समय के साथ विकसित हुई। अंत में, यह शहर के विनाश और फिर से उभरने की कहानी बताता है, जो शिवाजी महाराज के उदय की ओर ले जाती है।
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Chapters
- लाखों साल पहले, पुणे का इलाका जंगलों, गुफाओं और रॉक शेल्टरों से भरा था।
- यहां रहने वाले लोग शिकारी और संग्राहक थे, जो औजार बनाते थे और शिकार करते थे।
- उस समय के वन्यजीवों में हिप्पोपोटामस और शुतुरमुर्ग जैसे जानवर शामिल थे।
- यह इलाका तब 'पुणे' नहीं कहलाता था, बल्कि यह आदिम मनुष्यों का जंगल था।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि पुणे का वर्तमान स्वरूप एक लंबी और जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है, जिसकी शुरुआत लाखों साल पहले हुई थी।
शुतुरमुर्ग का शिकार करना और आग के पास बैठकर कहानियां सुनाना।
- गुफाओं से निकलकर मनुष्यों ने घर बनाना और वस्तुओं का आदान-प्रदान (स्वैपिंग) शुरू किया, जिससे सभ्यता का जन्म हुआ।
- सातवाहन काल में, कल्याण से नानीघाट तक एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पुणे के पास से गुजरता था।
- इस व्यापार मार्ग पर एक छोटी सी बस्ती विकसित होने लगी।
- वाकाटक और चालुक्य जैसे राजवंशों ने इस क्षेत्र पर शासन किया, लेकिन पुणे एक बफर जोन बना रहा।
यह बताता है कि कैसे भौगोलिक स्थिति और व्यापार ने पुणे को एक छोटी बस्ती से एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने में मदद की।
कल्याण से नानीघाट तक का व्यापार मार्ग जो आज के पुणे से कुछ घंटे की दूरी पर है।
- 8वीं शताब्दी में राष्ट्रकूटों के आगमन से पुणे का महत्व बढ़ा।
- राष्ट्रकूट राजा कृष्ण ने अपनी पत्नी की इच्छा पर पाषाण (पत्थर) से बनी एक भव्य वास्तुकला, पातालेश्वर गुफाएं, बनवाईं।
- 758 ईस्वी में, राष्ट्रकूट काल में, पुणे का पहला लिखित नाम 'पुण्य विषय' दर्ज किया गया।
- पुगाड़ी भट्ट नामक एक ब्राह्मण को बोपखेड़ गांव (आज का पुणे) इनाम में मिला, जो 'पुण्य विषय' का हिस्सा था।
- 'विषय' उस समय 100 गांवों का मुख्यालय होता था, जहां कर संग्रह और प्रशासनिक कार्य होते थे।
यह अध्याय पुणे के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है क्योंकि यहीं पर शहर का पहला ज्ञात नाम और एक संगठित प्रशासनिक इकाई के रूप में इसका उल्लेख मिलता है।
पातालेश्वर गुफाओं का निर्माण और पुगाड़ी भट्ट को 'पुण्य विषय' के हिस्से के रूप में बोपखेड़ गांव का अनुदान।
- शिलाहार राजा अपरजित ने 'पुण्य विषय' पर विजय प्राप्त करने का दावा किया।
- बाद में, यादवों ने शासन संभाला और 'पुण्य विषय' का नाम बदलकर 'पुनवड़ी' कर दिया।
- इस दौरान, पुणे में पुण्येश्वर (शिव) और नारायणेश्वर (विष्णु) जैसे दो प्रमुख मंदिर बने, जो इसे एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र बनाते थे।
- संत नामदेव महाराज के अभंगों में इन मंदिरों का उल्लेख मिलता है।
यह दर्शाता है कि कैसे राजनीतिक सत्ता के बदलाव के साथ-साथ शहर की धार्मिक और आध्यात्मिक पहचान भी विकसित हुई।
पुण्येश्वर और नारायणेश्वर मंदिरों का निर्माण, जिनका उल्लेख संत नामदेव महाराज के अभंगों में है।
- पुनवड़ी कई महत्वपूर्ण व्यापार मार्गों के चौराहे पर स्थित थी, जिससे इसका सामरिक महत्व बढ़ गया।
- कोकण से पूर्वी दक्कन और सूरत से बीजापुर तक का व्यापार यहीं से गुजरता था।
- सह्याद्री की पहाड़ियों में स्थित कोना, चाकन, शिवनेरी और पुरंदर जैसे किलों ने इसकी सुरक्षा की।
- 14वीं-15वीं शताब्दी में, अरब जनरल 'बड़ा अरब' ने मुंजोबा टेक (आज का कस्बा पेठ) पर 'किले हिसार' नामक एक किले का निर्माण कराया।
- किले हिसार के निर्माण के बाद, पुनावडी को 'कस्बा पुणे' नाम मिला, जहां कस्बा का अर्थ था पास के गांवों या परगनों का मुख्य कार्यालय।
यह बताता है कि कैसे पुणे एक व्यापारिक केंद्र से एक किलेबंद और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण शहर में बदल गया, जिसने भविष्य के शासकों के लिए इसका महत्व बढ़ाया।
बड़ा अरब द्वारा 'किले हिसार' का निर्माण और 'कस्बा पुणे' का नामकरण।
- दिल्ली सल्तनत, बहमनी और फिर निजामशाही के अधीनता के बाद, मलिक अंबर ने मालोजी भोसले को पुणे की जागीर दी।
- मालोजी के बेटे शाहजी भोसले एक शक्तिशाली सरदार बने, लेकिन मुगलों और बीजापुर सल्तनत के दबाव के कारण उन्हें बीजापुर की सेवा में जाना पड़ा।
- शाहजी को दंडित करने के लिए, दुश्मनों ने पुणे को नष्ट कर दिया और अपमान के प्रतीक के रूप में जमीन पर गधे फिराए, यह कहते हुए कि यहां कुछ भी नहीं उगेगा।
- इस विनाश के बीच, एक मां और बेटे ने इस भूमि और उपमहाद्वीप के भाग्य को बदलने की तैयारी शुरू कर दी।
यह अध्याय पुणे के इतिहास में एक दुखद लेकिन महत्वपूर्ण घटना का वर्णन करता है, जो शहर के विनाश और फिर से उठ खड़े होने की कहानी का आधार बनती है।
दुश्मनों द्वारा पुणे को नष्ट करना और अपमान के प्रतीक के रूप में जमीन पर गधे फिराना।
Key takeaways
- पुणे का इतिहास लाखों साल पुराना है, जो शिकारी-संग्राहकों के समय से शुरू होता है।
- व्यापार मार्ग और भौगोलिक स्थिति ने पुणे को एक महत्वपूर्ण केंद्र बनने में मदद की।
- शहर का नाम और पहचान समय के साथ विभिन्न राजवंशों के शासन के तहत विकसित हुई।
- पुणे एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र भी रहा है, जैसा कि प्राचीन मंदिरों से पता चलता है।
- सामरिक महत्व के कारण, पुणे पर नियंत्रण के लिए कई युद्ध और संघर्ष हुए।
- शहर को विनाश का सामना करना पड़ा, लेकिन यह हमेशा मजबूत होकर उभरा है।
- पुणे का इतिहास केवल इमारतों और शासकों का नहीं, बल्कि लोगों की महत्वाकांक्षा, संघर्ष और लचीलेपन की कहानी है।
Key terms
Hunter-gatherersTrade RouteSatavahanasRashtrakutasPataleshwar CavesPunya VishayYadavasPunyashwar TempleNarayanashwar TempleKile HisarQasba PuneMaloji BhosaleShahaji BhosaleDestruction Ritual
Test your understanding
- पुणे के प्रागैतिहासिक काल में रहने वाले लोग किस प्रकार का जीवन जीते थे और उनके मुख्य कार्य क्या थे?
- पुणे का नाम 'पुण्य विषय' कैसे पड़ा और उस समय इसका क्या महत्व था?
- राष्ट्रकूट और यादव काल के दौरान पुणे में कौन से प्रमुख मंदिर बनाए गए और उनका क्या महत्व था?
- मध्ययुगीन काल में 'किले हिसार' के निर्माण ने पुणे के विकास को कैसे प्रभावित किया?
- शाहजी भोसले के समय पुणे को किस प्रकार के विनाश का सामना करना पड़ा और इसका क्या प्रतीकात्मक अर्थ था?