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Cost of Capital | Financial Management Chapter-3 | BCOM/ BBA Semester Exam
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Cost of Capital | Financial Management Chapter-3 | BCOM/ BBA Semester Exam

CWG for BCom

5 chapters6 takeaways12 key terms5 questions

Overview

यह वीडियो 'कॉस्ट ऑफ कैपिटल' की अवधारणा को समझाता है, जो फाइनेंशियल मैनेजमेंट का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें बताया गया है कि किसी भी बिजनेस को चलाने के लिए जो पैसा (कैपिटल) लगाया जाता है, उसकी एक लागत होती है। वीडियो विभिन्न स्रोतों जैसे इक्विटी शेयर, प्रेफरेंस शेयर, डिबेंचर और रिटेन अर्निंग्स से कैपिटल जुटाने की प्रक्रिया और उनसे जुड़ी लागतों की गणना के तरीकों पर केंद्रित है। यह विभिन्न प्रकार के डिबेंचर (रिडीमेबल और इरिडीमेबल) और प्रेफरेंस शेयर के लिए कॉस्ट ऑफ कैपिटल निकालने के फॉर्मूले बताता है, साथ ही कॉस्ट ऑफ इक्विटी की गणना के लिए सीएपीएम, डिविडेंड यील्ड और अर्निंग यील्ड जैसे तरीकों की भी व्याख्या करता है। अंत में, कॉस्ट ऑफ रिटेन अर्निंग्स को भी समझाया गया है।

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Chapters

  • बिजनेस को चलाने के लिए आवश्यक कैपिटल (पूंजी) की एक लागत होती है, जिसे कॉस्ट ऑफ कैपिटल कहते हैं।
  • कैपिटल विभिन्न स्रोतों से जुटाई जा सकती है, जैसे इक्विटी शेयर, प्रेफरेंस शेयर, डिबेंचर और रिटेन अर्निंग्स।
  • प्रत्येक स्रोत से जुटाई गई कैपिटल पर निवेशकों को एक निश्चित रिटर्न की उम्मीद होती है, जो उस कैपिटल की लागत बन जाती है।
कॉस्ट ऑफ कैपिटल को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कंपनी की निवेश परियोजनाओं के मूल्यांकन और वित्तीय निर्णय लेने का आधार बनती है।
एक कंपनी इक्विटी शेयर जारी करके ₹10 लाख, प्रेफरेंस शेयर से ₹2 लाख, डिबेंचर से ₹3 लाख और रिटेन अर्निंग्स से ₹1 लाख जुटाती है, जिससे कुल ₹16 लाख की कैपिटल बनती है। इन सभी स्रोतों की अपनी-अपनी लागतें होती हैं।
  • डिबेंचर दो प्रकार के होते हैं: इरिडीमेबल (जिनका भुगतान कंपनी के बंद होने पर होता है) और रिडीमेबल (जिनका भुगतान एक निश्चित अवधि के बाद होता है)।
  • इरिडीमेबल डिबेंचर के लिए कॉस्ट ऑफ डिबेंचर (Kd) का फार्मूला है: (Interest * (1-t)) / Net Proceeds * 100, जहाँ 't' टैक्स रेट है।
  • रिडीमेबल डिबेंचर के लिए कॉस्ट ऑफ डिबेंचर (Kd) का फार्मूला थोड़ा जटिल है जिसमें रिडीमेबल वैल्यू (RV) और नेट प्रोसीड्स (NP) का उपयोग होता है: (Interest * (1-t) + (RV - NP)/n) / ((RV + NP)/2) * 100।
डिबेंचर की लागत की गणना यह समझने में मदद करती है कि कंपनी को उधार लिए गए धन पर कितना खर्च करना पड़ रहा है, जो कि टैक्स-डिडक्टिबल होने के कारण अक्सर सबसे सस्ता स्रोत होता है।
इरिडीमेबल डिबेंचर के लिए, यदि ₹1000 के डिबेंचर पर 8% ब्याज है, टैक्स रेट 30% है, और नेट प्रोसीड ₹950 है, तो Kd की गणना की जा सकती है।
  • प्रेफरेंस शेयर पर एक निश्चित दर से डिविडेंड का भुगतान किया जाता है।
  • इरिडीमेबल प्रेफरेंस शेयर के लिए कॉस्ट ऑफ प्रेफरेंस (Kp) का फार्मूला है: (Preference Dividend / Net Proceeds) * 100।
  • रिडीमेबल प्रेफरेंस शेयर के लिए कॉस्ट ऑफ प्रेफरेंस (Kp) का फार्मूला कॉस्ट ऑफ रिडीमेबल डिबेंचर के समान होता है, जिसमें इंटरेस्ट की जगह प्रेफरेंस डिविडेंड का उपयोग किया जाता है।
प्रेफरेंस शेयर की लागत कंपनी के लिए एक निश्चित व्यय का प्रतिनिधित्व करती है, जो इक्विटी की तुलना में कम जोखिम भरा होता है लेकिन डिबेंचर से अधिक महंगा हो सकता है।
यदि एक प्रेफरेंस शेयर पर ₹10 का डिविडेंड है और नेट प्रोसीड ₹100 है, तो इरिडीमेबल प्रेफरेंस शेयर की लागत की गणना की जा सकती है।
  • कॉस्ट ऑफ इक्विटी वह रिटर्न है जो इक्विटी शेयरधारक कंपनी से उम्मीद करते हैं।
  • इसकी गणना के कई तरीके हैं, जिनमें कैपिटल एसेट प्राइसिंग मॉडल (CAPM) सबसे प्रमुख है।
  • CAPM का फार्मूला है: Ke = Rf + Beta * (Rm - Rf), जहाँ Rf रिस्क-फ्री रेट, Rm मार्केट रिटर्न और Beta कंपनी के जोखिम का माप है।
  • अन्य तरीकों में डिविडेंड यील्ड (D/NP) और अर्निंग यील्ड (E/NP) शामिल हैं, जिन्हें ग्रोथ रेट (g) के साथ भी जोड़ा जा सकता है (जैसे D/NP + g)।
कॉस्ट ऑफ इक्विटी कंपनी के लिए सबसे महंगी कैपिटल होती है क्योंकि इक्विटी शेयरधारकों का जोखिम सबसे अधिक होता है और वे उच्चतम रिटर्न की उम्मीद करते हैं।
यदि रिस्क-फ्री रेट 10% है, मार्केट रिटर्न 15% है, और कंपनी का बीटा 1.2 है, तो CAPM का उपयोग करके कॉस्ट ऑफ इक्विटी की गणना की जा सकती है।
  • रिटेन अर्निंग्स वह लाभ है जो कंपनी ने कमाया है और शेयरधारकों को डिविडेंड के रूप में वितरित नहीं किया है।
  • कॉस्ट ऑफ रिटेन अर्निंग्स (Kr) की गणना कॉस्ट ऑफ इक्विटी (Ke) के समान ही की जाती है।
  • मुख्य अंतर यह है कि Kr की गणना करते समय नेट प्रोसीड से फ्लोटेशन कॉस्ट को नहीं घटाया जाता है, क्योंकि रिटेन अर्निंग्स को जारी करने में कोई फ्लोटेशन कॉस्ट नहीं लगती है।
रिटेन अर्निंग्स का उपयोग करने की भी एक लागत होती है, क्योंकि शेयरधारक उस पैसे पर भी रिटर्न की उम्मीद करते हैं जिसे कंपनी ने व्यवसाय में फिर से निवेश किया है।
यदि कॉस्ट ऑफ इक्विटी की गणना में नेट प्रोसीड ₹90 है (₹100 इशू प्राइस - ₹10 फ्लोटेशन कॉस्ट), तो कॉस्ट ऑफ रिटेन अर्निंग्स की गणना करते समय नेट प्रोसीड ₹100 ही माना जाएगा।

Key takeaways

  1. 1कॉस्ट ऑफ कैपिटल विभिन्न स्रोतों से जुटाई गई पूंजी की औसत लागत है, जो कंपनी के निवेश निर्णयों के लिए महत्वपूर्ण है।
  2. 2डिबेंचर की लागत की गणना करते समय रिडीमेबल और इरिडीमेबल प्रकृति का ध्यान रखना आवश्यक है।
  3. 3प्रेफरेंस शेयर की लागत निश्चित होती है और यह डिबेंचर से अधिक लेकिन इक्विटी से कम होती है।
  4. 4इक्विटी की लागत सबसे अधिक होती है क्योंकि इसमें शेयरधारकों का जोखिम सबसे ज्यादा होता है।
  5. 5CAPM, डिविडेंड यील्ड और अर्निंग यील्ड जैसे मॉडल कॉस्ट ऑफ इक्विटी की गणना में मदद करते हैं।
  6. 6रिटेन अर्निंग्स की लागत इक्विटी की लागत के बराबर होती है, लेकिन इसमें फ्लोटेशन कॉस्ट शामिल नहीं होती है।

Key terms

Cost of CapitalEquity SharePreference ShareDebentureRetained EarningsNet Proceeds (NP)Redeemable Value (RV)Floatation CostCAPM (Capital Asset Pricing Model)Risk-Free Rate (Rf)Market Return (Rm)Beta

Test your understanding

  1. 1कॉस्ट ऑफ कैपिटल क्या है और यह कंपनी के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?
  2. 2इरिडीमेबल और रिडीमेबल डिबेंचर के लिए कॉस्ट ऑफ डिबेंचर की गणना के फॉर्मूले में क्या अंतर है?
  3. 3कॉस्ट ऑफ इक्विटी की गणना के लिए CAPM मॉडल कैसे काम करता है?
  4. 4कॉस्ट ऑफ इक्विटी और कॉस्ट ऑफ रिटेन अर्निंग्स के बीच मुख्य अंतर क्या है?
  5. 5नेट प्रोसीड (NP) और रिडीमेबल वैल्यू (RV) की गणना में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?

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