
38:06
SUPER TET 2021 child psychology LIVE CLASS Supertet Classes/ STET
Chandra Institute Allahabad
Overview
यह वीडियो मुस्लिम कालीन शिक्षा प्रणाली पर केंद्रित है, जिसमें इसकी शुरुआत, संरचना, पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियों और अनुशासन पर प्रकाश डाला गया है। इसमें मकतब और मदरसों जैसी संस्थाओं, शिक्षा के माध्यम के रूप में अरबी और फारसी भाषाओं के उपयोग, और शिक्षा के उद्देश्यों पर चर्चा की गई है। वीडियो में इस काल की शिक्षा की खूबियों और खामियों, जैसे कि धार्मिक प्रचार पर जोर और कठोर अनुशासन, को भी उजागर किया गया है। अंत में, यह स्त्री शिक्षा की स्थिति और उच्च शिक्षा में उपलब्ध विभिन्न शैक्षणिक धाराओं का भी उल्लेख करता है।
How was this?
Save this permanently with flashcards, quizzes, and AI chat
Chapters
- मुस्लिम कालीन शिक्षा की शुरुआत 'बिस्मिल्लाह खानी' नामक रस्म से होती थी।
- इस रस्म के लिए बच्चे की न्यूनतम आयु 4 वर्ष, 4 महीने और 4 दिन निर्धारित थी।
- इस संस्कार के दौरान, छात्र नए वस्त्र पहनकर मौलवी या उस्ताद के सामने बैठता था।
- छात्र को कुरान शरीफ की कुछ आयतें दोहराने के लिए कहा जाता था, और यदि वह नहीं दोहरा पाता तो केवल 'बिस्मिल्लाह' कहना ही पर्याप्त होता था।
यह रस्म शिक्षा की औपचारिक शुरुआत का प्रतीक थी और बच्चे के शैक्षिक जीवन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर मानी जाती थी, जो सीखने की प्रक्रिया को एक धार्मिक और सांस्कृतिक संदर्भ प्रदान करती थी।
चार साल, चार महीने और चार दिन का बच्चा नए कपड़े पहनकर मौलवी के सामने बैठकर कुरान की आयतें दोहराने की कोशिश करता है।
- मुस्लिम कालीन शिक्षा को दो मुख्य भागों में विभाजित किया गया था: प्राथमिक शिक्षा 'मकतब' में और उच्च शिक्षा 'मदरसों' में।
- 'मकतब' शब्द अरबी भाषा के 'कुतुब' (पढ़ना-लिखना) से निकला है, जो प्राथमिक स्तर की शिक्षा को दर्शाता है।
- 'मदरसा' शब्द अरबी भाषा के 'दरस' (भाषण देना या अध्ययन करना) से निकला है, जो उच्च शिक्षा के संस्थानों को इंगित करता है।
- प्राथमिक स्तर पर अरबी और फारसी के अक्षर और बुनियादी पढ़ना-लिखना सिखाया जाता था, जबकि मदरसों में गहन अध्ययन होता था।
मकतब और मदरसों का यह विभाजन शिक्षा को एक संरचित ढाँचा प्रदान करता था, जिससे विभिन्न स्तरों पर छात्रों की आवश्यकताओं और सीखने के उद्देश्यों को पूरा किया जा सके।
बच्चों को बुनियादी पढ़ना-लिखना सिखाने के लिए मकतब होते थे, जबकि उच्च शिक्षा और विशेष ज्ञान के लिए मदरसे होते थे।
- शुरुआत में शिक्षा का माध्यम अरबी भाषा थी, जो बाद में फारसी भाषा के प्रभाव के साथ विकसित हुई।
- काफी हद तक शिक्षा निशुल्क थी, क्योंकि मुस्लिम शासकों ने इस्लाम और अपनी संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए मकतब और मदरसों का निर्माण कराया था।
- शिक्षा पर राज्य का नियंत्रण मजबूत हो गया था, जिससे शासकों के उद्देश्यों का प्रभाव शिक्षा पर पड़ने लगा।
शिक्षा के माध्यम और शासकों के उद्देश्यों का शिक्षा प्रणाली पर सीधा प्रभाव पड़ता था, जो न केवल ज्ञान के प्रसार को बल्कि सांस्कृतिक और धार्मिक विचारों को भी आकार देता था।
मुस्लिम शासकों ने अपने धर्म और संस्कृति को फैलाने के लिए मदरसों का निर्माण करवाया, जिससे शिक्षा पर उनका नियंत्रण बढ़ा।
- उच्च स्तर पर शिक्षा को दो भागों में विभाजित किया गया था: पारलौकिक (धार्मिक) और लौकिक (गैर-धार्मिक)।
- छात्र अपनी रुचि के अनुसार धार्मिक अध्ययन (कुरान, सूफी साहित्य) या लौकिक अध्ययन (दर्शन, राजनीति शास्त्र, ज्योतिष) चुन सकते थे।
- विभिन्न विषयों में निपुणता के आधार पर उपाधियाँ दी जाती थीं, जैसे 'आमिल' (इस्लाम धर्म में विशेष ज्ञान), 'कामिल' (अरबी-फारसी साहित्य में निपुण), 'फाजिल' (तर्कशास्त्र में निपुण), और 'आलिज' (गणित में निपुण)।
उच्च शिक्षा में विभिन्न धाराओं और उपाधियों की व्यवस्था छात्रों को विशेषज्ञता हासिल करने और समाज में विशिष्ट भूमिका निभाने के लिए तैयार करती थी।
गणित में निपुण छात्र को 'आलिज' की उपाधि दी जाती थी, जबकि तर्कशास्त्र में निपुण छात्र 'फाजिल' कहलाता था।
- प्राथमिक स्तर पर पढ़ने-लिखने पर जोर था, जिसमें 'शेख सादी' की कहानियाँ और कुरान की आयतें रटाई जाती थीं।
- कई बार आयतों को बिना समझे रटवाया जाता था, जो इस शिक्षा प्रणाली का एक दोष माना जाता है।
- लेखन, सामान्य गणित और अन्य विषय भी सिखाए जाते थे।
- अनुशासन पर बहुत जोर था, और गंभीर गलतियों के लिए छात्रों को मुर्गा बनाना या कोड़े मारना जैसे कठोर दंड दिए जाते थे।
- मेधावी छात्रों के लिए भोजन और छात्रावास की व्यवस्था भी थी।
यह खंड उस समय की शिक्षण विधियों और अनुशासन की प्रकृति को दर्शाता है, जिसमें रटने पर अत्यधिक जोर और कठोर दंड शामिल थे, लेकिन साथ ही मेधावी छात्रों के लिए प्रोत्साहन की व्यवस्था भी थी।
गंभीर गलती करने पर छात्र को मुर्गा बनाया जाता था या कोड़े मारे जाते थे, लेकिन अच्छे छात्रों के लिए छात्रावास की सुविधा भी उपलब्ध थी।
- पर्दा प्रथा के कारण स्त्री शिक्षा का स्तर बहुत बेहतर नहीं था।
- हालांकि, राजपरिवार और धनी वर्ग की महिलाएं घर पर ही निजी मौलवियों से शिक्षा प्राप्त करती थीं।
- यह शिक्षा मुख्य रूप से घर की महिलाओं के लिए होती थी।
यह बताता है कि उस काल में महिलाओं की शिक्षा तक पहुँच सीमित थी और यह मुख्य रूप से उच्च वर्ग तक ही सीमित थी, जो तत्कालीन सामाजिक संरचना को दर्शाता है।
धनी परिवारों की महिलाएं अपने घर पर ही निजी शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त करती थीं।
Key takeaways
- मुस्लिम कालीन शिक्षा प्रणाली का प्रारंभ 'बिस्मिल्लाह खानी' रस्म से होता था, जो एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और धार्मिक संस्कार था।
- शिक्षा मुख्य रूप से मकतब (प्राथमिक) और मदरसों (उच्च) में विभाजित थी, जिनका उद्देश्य धार्मिक और लौकिक ज्ञान प्रदान करना था।
- अरबी और फारसी भाषाएँ शिक्षा के प्रमुख माध्यम थीं, और शिक्षा काफी हद तक निशुल्क थी, जिसका उद्देश्य इस्लाम और संस्कृति का प्रसार करना था।
- उच्च शिक्षा में विभिन्न विषयों में विशेषज्ञता के लिए उपाधियाँ प्रदान की जाती थीं, जो छात्रों को विशिष्ट क्षेत्रों में तैयार करती थीं।
- शिक्षण विधियों में रटने पर अधिक जोर था, और अनुशासन बहुत कठोर था, जिसमें गंभीर गलतियों के लिए शारीरिक दंड का प्रावधान था।
- स्त्री शिक्षा सीमित थी और मुख्य रूप से उच्च वर्ग की महिलाओं तक ही सीमित थी, जो घर पर निजी शिक्षकों से शिक्षा प्राप्त करती थीं।
- शिक्षा पर राज्य का नियंत्रण बढ़ने से यह शासकों के धार्मिक और सांस्कृतिक एजेंडे का एक उपकरण बन गई थी।
Key terms
बिस्मिल्लाह खानी रस्ममकतबमदरसाआमिलकामिलफाजिलआलिजपर्दा प्रथालौकिक शिक्षापारलौकिक शिक्षा
Test your understanding
- मुस्लिम कालीन शिक्षा की शुरुआत किस रस्म से होती थी और इसके लिए न्यूनतम आयु क्या थी?
- मकतब और मदरसों में क्या अंतर था और वे शिक्षा प्रणाली के किन स्तरों का प्रतिनिधित्व करते थे?
- मुस्लिम कालीन शिक्षा के मुख्य उद्देश्य क्या थे और शिक्षा का माध्यम कौन सी भाषाएँ थीं?
- उच्च शिक्षा में छात्रों को उनकी विशेषज्ञता के आधार पर कौन सी उपाधियाँ दी जाती थीं?
- मुस्लिम कालीन शिक्षा प्रणाली में अनुशासन के क्या प्रावधान थे और स्त्री शिक्षा की क्या स्थिति थी?