
Dars-3 | 17 September
Maryam Islamic Academy
Overview
यह वीडियो तिलावत (कुरान पाठ) के दो मुख्य पहलुओं पर केंद्रित है: 'उयूब-ए-तिलावत' (तिलावत की खामियां) और 'तरीके-ए-तिलावत' (तिलावत के तरीके)। उयूब-ए-तिलावत में, यह उन सामान्य गलतियों पर चर्चा करता है जो पाठ के दौरान हो सकती हैं, जैसे कि मद को गलत खींचना, साकिन हुरूफ को हरकत देना, हुरूफ की पूरी अदायगी न करना, और इद्गाम के नियमों का पालन न करना। यह 'लहने जल्ली' (स्पष्ट गलतियां) और 'लहने खफी' (छिपी हुई गलतियां) के बीच अंतर बताता है, और यह भी बताता है कि कैसे कुछ गलतियां अर्थ को बदल सकती हैं और कबीरा गुनाह का कारण बन सकती हैं। तरीके-ए-तिलावत में, यह कुरान की तिलावत शुरू करने के चार तरीकों पर प्रकाश डालता है, जिसमें 'त'आवुज़' (अऊजु बिल्लाह) और 'तस्मिया' (बिस्मिल्लाह) को मिलाना या अलग करना शामिल है। यह बताता है कि कौन से तरीके सूरत की शुरुआत में जायज हैं और कौन से तरीके सूरत के बीच से शुरू करने पर जायज हैं, और सूरतुल तौबा के विशेष मामले पर भी चर्चा करता है, जिसे बिस्मिल्लाह के बिना पढ़ा जाता है।
Save this permanently with flashcards, quizzes, and AI chat
Chapters
- मद-ए-असली को उसकी सही मिकदार से ज्यादा लंबा खींचना तिलावत में एक ऐब है।
- साकिन हुरूफ को हरकत देकर पढ़ना या हरकत वाले हुरूफ को साकिन करके पढ़ना भी तिलावत में नुक्स पैदा करता है।
- हुरूफ की मुकम्मल अदायगी न करना या अल्फाज़ को अधूरा पढ़ना भी एक गलती है।
- जहां इद्गाम (मिलाना) न हो वहां इद्गाम करना या जहां हो वहां न करना भी तिलावत में ऐब है।
- इनमें से कुछ गलतियां 'लहने जल्ली' (स्पष्ट गलती) कहलाती हैं, जो अर्थ बदल सकती हैं और कबीरा गुनाह का कारण बन सकती हैं।
- लहने जल्ली (स्पष्ट गलती) वह गलती है जो आसानी से पहचानी जा सकती है और अक्सर कुरान के अर्थ को पूरी तरह बदल देती है।
- हरकात (ज़बर, ज़ेर, पेश) को ज्यादा लंबा खींचना भी लहने जल्ली है, जैसे 'कौ'ला' (उसने कहा) को 'कौ'ल्ला' (उन दोनों ने कहा) की तरह पढ़ना, जिससे अर्थ बदल जाता है।
- हुरूफ के मखरज (उच्चारण स्थान) और आवाज़ का ख्याल न रखना, जैसे 'व' और 'ज़' के बीच का फर्क न करना, भी अर्थ बदल सकता है (जैसे 'वल्ला' का अर्थ गुमराह होना और 'जल्ला' का अर्थ कमजोर होना)।
- ये गलतियां कबीरा गुनाह की श्रेणी में आती हैं और इनसे बचना हराम है।
- कुरान की तिलावत शुरू करने के चार मुख्य तरीके हैं: वसले कुल, फसले कुल, वसले अव्वल, और फसले सानी।
- वस्ल का मतलब है मिलाना, और फसल का मतलब है जुदा करना।
- वस्ले कुल: ता'आवुज़, तस्मिया और सूरत को एक साथ मिलाना।
- फसले कुल: ता'आवुज़, तस्मिया और सूरत को अलग-अलग पढ़ना।
- वस्ले अव्वल: ता'आवुज़ और तस्मिया को मिलाकर पढ़ना, लेकिन सूरत को अलग पढ़ना।
- फसले सानी: ता'आवुज़ को अलग पढ़ना, और तस्मिया और सूरत को मिलाकर पढ़ना।
- अगर तिलावत किसी सूरत की शुरुआत से हो रही है, तो चारों तरीके (वस्ले कुल, फसले कुल, वसले अव्वल, फसले सानी) जायज हैं।
- अगर तिलावत सूरत के बीच के हिस्से से शुरू हो रही है, तो केवल दो तरीके जायज हैं: फसले कुल (सबको अलग पढ़ना) और वसले अव्वल (ता'आवुज़ और तस्मिया मिलाकर, सूरत को अलग पढ़ना)।
- सूरत के बीच से शुरू करते समय, वसले कुल (तीनों को मिलाकर पढ़ना) और वसले अव्वल/फसले सानी (ता'आवुज़ अलग, तस्मिया और सूरत मिलाकर पढ़ना) नाजायज हैं क्योंकि इससे बिस्मिल्लाह का संबंध स्पष्ट नहीं होता।
- बिस्मिल्लाह को पिछली सूरत से मिलाकर पढ़ना या अगली सूरत से मिलाकर पढ़ना, जब तिलावत बीच से हो रही हो, जायज नहीं है।
- जब तिलावत जारी हो और एक सूरत खत्म होकर दूसरी शुरू हो रही हो (जैसे सूरह नास के बाद सूरह फलक), तो तीन तरीके जायज हैं और एक नाजायज।
- जायज तरीके हैं: फसले कुल (सबको अलग पढ़ना), वसले अव्वल (ता'आवुज़ और तस्मिया मिलाकर, सूरत को अलग पढ़ना), और फसले सानी (ता'आवुज़ अलग, तस्मिया और सूरत मिलाकर पढ़ना)।
- नाजायज तरीका है: वसले अव्वल/फसले सानी का वो रूप जिसमें पिछली सूरत के अंत को तस्मिया से मिलाया जाता है।
- यह नाजायज है क्योंकि इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि बिस्मिल्लाह पिछली सूरत का हिस्सा है या अगली का।
- सूरतुल तौबा को शुरू करते समय न तो 'ता'आवुज़' (अऊजु बिल्लाह) पढ़ा जाता है और न ही 'तस्मिया' (बिस्मिल्लाह)।
- यह नियम तब लागू होता है जब सूरतुल तौबा से तिलावत शुरू की जाए, या सूरतुल अनफाल के बाद सूरतुल तौबा पर जाया जाए।
- 'ता'आवुज़' को 'इस्तियाज़ा' भी कहा जाता है, और 'तस्मिया' को 'बस्मला' भी कहा जाता है।
- यदि बुलंद आवाज में तिलावत की जा रही है, तो ता'आवुज़ और तस्मिया भी बुलंद आवाज में पढ़े जाने चाहिए; यदि आहिस्ता आवाज में, तो आहिस्ता।
Key takeaways
- कुरान की तिलावत में गलतियां (उयूब-ए-तिलावत) अर्थ को बदल सकती हैं और उन्हें 'लहने जल्ली' कहा जाता है, जो कबीरा गुनाह का कारण बन सकती हैं।
- मद, साकिन हुरूफ, हुरूफ की अदायगी और इद्गाम के नियमों का सही पालन करना तिलावत की शुद्धता के लिए आवश्यक है।
- कुरान की तिलावत शुरू करने के चार तरीके हैं, और उनकी जायज़ता इस बात पर निर्भर करती है कि आप सूरत की शुरुआत कर रहे हैं या बीच से।
- सूरत के बीच से तिलावत शुरू करते समय, बिस्मिल्लाह को पिछली या अगली सूरत से मिलाना नाजायज है।
- सूरतुल तौबा को तिलावत में शुरू करते समय बिस्मिल्लाह के बिना पढ़ा जाता है, चाहे वह कुरान की शुरुआत हो या बीच से।
- ता'आवुज़ को इस्तियाज़ा और तस्मिया को बस्मला भी कहा जाता है, और इन नामों को जानना महत्वपूर्ण है।
- तिलावत की आवाज (बुलंद या आहिस्ता) के अनुसार ता'आवुज़ और तस्मिया की आवाज भी तय होती है।
Key terms
Test your understanding
- तिलावत में 'लहने जल्ली' किसे कहते हैं और यह अर्थ को कैसे प्रभावित कर सकती है?
- साकिन हुरूफ को हरकत देकर पढ़ने से तिलावत में क्या ऐब पैदा होता है?
- कुरान की तिलावत शुरू करने के चार तरीकों के नाम बताएं और समझाएं कि सूरत की शुरुआत में कौन से जायज हैं?
- अगर कोई व्यक्ति सूरत के बीच से तिलावत शुरू कर रहा है, तो उसे बिस्मिल्लाह के संबंध में किन नियमों का पालन करना चाहिए?
- सूरतुल तौबा को तिलावत में शुरू करते समय बिस्मिल्लाह क्यों नहीं पढ़ा जाता है?