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Dars-3 | 17 September
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Dars-3 | 17 September

Maryam Islamic Academy

6 chapters7 takeaways17 key terms5 questions

Overview

यह वीडियो तिलावत (कुरान पाठ) के दो मुख्य पहलुओं पर केंद्रित है: 'उयूब-ए-तिलावत' (तिलावत की खामियां) और 'तरीके-ए-तिलावत' (तिलावत के तरीके)। उयूब-ए-तिलावत में, यह उन सामान्य गलतियों पर चर्चा करता है जो पाठ के दौरान हो सकती हैं, जैसे कि मद को गलत खींचना, साकिन हुरूफ को हरकत देना, हुरूफ की पूरी अदायगी न करना, और इद्गाम के नियमों का पालन न करना। यह 'लहने जल्ली' (स्पष्ट गलतियां) और 'लहने खफी' (छिपी हुई गलतियां) के बीच अंतर बताता है, और यह भी बताता है कि कैसे कुछ गलतियां अर्थ को बदल सकती हैं और कबीरा गुनाह का कारण बन सकती हैं। तरीके-ए-तिलावत में, यह कुरान की तिलावत शुरू करने के चार तरीकों पर प्रकाश डालता है, जिसमें 'त'आवुज़' (अऊजु बिल्लाह) और 'तस्मिया' (बिस्मिल्लाह) को मिलाना या अलग करना शामिल है। यह बताता है कि कौन से तरीके सूरत की शुरुआत में जायज हैं और कौन से तरीके सूरत के बीच से शुरू करने पर जायज हैं, और सूरतुल तौबा के विशेष मामले पर भी चर्चा करता है, जिसे बिस्मिल्लाह के बिना पढ़ा जाता है।

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Chapters

  • मद-ए-असली को उसकी सही मिकदार से ज्यादा लंबा खींचना तिलावत में एक ऐब है।
  • साकिन हुरूफ को हरकत देकर पढ़ना या हरकत वाले हुरूफ को साकिन करके पढ़ना भी तिलावत में नुक्स पैदा करता है।
  • हुरूफ की मुकम्मल अदायगी न करना या अल्फाज़ को अधूरा पढ़ना भी एक गलती है।
  • जहां इद्गाम (मिलाना) न हो वहां इद्गाम करना या जहां हो वहां न करना भी तिलावत में ऐब है।
  • इनमें से कुछ गलतियां 'लहने जल्ली' (स्पष्ट गलती) कहलाती हैं, जो अर्थ बदल सकती हैं और कबीरा गुनाह का कारण बन सकती हैं।
तिलावत की खामियों को समझना महत्वपूर्ण है ताकि हम कुरान के अर्थ को बिगाड़ने वाली गलतियों से बच सकें और अल्लाह के कलाम को सही ढंग से पढ़ सकें।
नून को साकिन की जगह हरकत देकर 'अनामता' पढ़ना जबकि सही 'अनअमता' है।
  • लहने जल्ली (स्पष्ट गलती) वह गलती है जो आसानी से पहचानी जा सकती है और अक्सर कुरान के अर्थ को पूरी तरह बदल देती है।
  • हरकात (ज़बर, ज़ेर, पेश) को ज्यादा लंबा खींचना भी लहने जल्ली है, जैसे 'कौ'ला' (उसने कहा) को 'कौ'ल्ला' (उन दोनों ने कहा) की तरह पढ़ना, जिससे अर्थ बदल जाता है।
  • हुरूफ के मखरज (उच्चारण स्थान) और आवाज़ का ख्याल न रखना, जैसे 'व' और 'ज़' के बीच का फर्क न करना, भी अर्थ बदल सकता है (जैसे 'वल्ला' का अर्थ गुमराह होना और 'जल्ला' का अर्थ कमजोर होना)।
  • ये गलतियां कबीरा गुनाह की श्रेणी में आती हैं और इनसे बचना हराम है।
यह समझना कि कैसे छोटी-छोटी गलतियां भी कुरान के अर्थ को गंभीर रूप से बदल सकती हैं, हमें अधिक सावधानी और ध्यान से तिलावत करने के लिए प्रेरित करता है।
'कौ'ला' को 'कौ'ल्ला' की तरह खींचकर पढ़ना, जिससे अर्थ 'उसने कहा' से 'उन दोनों ने कहा' में बदल जाता है।
  • कुरान की तिलावत शुरू करने के चार मुख्य तरीके हैं: वसले कुल, फसले कुल, वसले अव्वल, और फसले सानी।
  • वस्ल का मतलब है मिलाना, और फसल का मतलब है जुदा करना।
  • वस्ले कुल: ता'आवुज़, तस्मिया और सूरत को एक साथ मिलाना।
  • फसले कुल: ता'आवुज़, तस्मिया और सूरत को अलग-अलग पढ़ना।
  • वस्ले अव्वल: ता'आवुज़ और तस्मिया को मिलाकर पढ़ना, लेकिन सूरत को अलग पढ़ना।
  • फसले सानी: ता'आवुज़ को अलग पढ़ना, और तस्मिया और सूरत को मिलाकर पढ़ना।
तिलावत शुरू करने के विभिन्न तरीकों को जानने से हमें यह समझने में मदद मिलती है कि कुरान को कैसे शुरू किया जा सकता है और कौन से तरीके अधिक उपयुक्त हैं।
ता'आवुज़ और तस्मिया को एक सांस में मिलाकर पढ़ना (वस्ले कुल) बनाम उन्हें अलग-अलग पढ़ना (फसले कुल)।
  • अगर तिलावत किसी सूरत की शुरुआत से हो रही है, तो चारों तरीके (वस्ले कुल, फसले कुल, वसले अव्वल, फसले सानी) जायज हैं।
  • अगर तिलावत सूरत के बीच के हिस्से से शुरू हो रही है, तो केवल दो तरीके जायज हैं: फसले कुल (सबको अलग पढ़ना) और वसले अव्वल (ता'आवुज़ और तस्मिया मिलाकर, सूरत को अलग पढ़ना)।
  • सूरत के बीच से शुरू करते समय, वसले कुल (तीनों को मिलाकर पढ़ना) और वसले अव्वल/फसले सानी (ता'आवुज़ अलग, तस्मिया और सूरत मिलाकर पढ़ना) नाजायज हैं क्योंकि इससे बिस्मिल्लाह का संबंध स्पष्ट नहीं होता।
  • बिस्मिल्लाह को पिछली सूरत से मिलाकर पढ़ना या अगली सूरत से मिलाकर पढ़ना, जब तिलावत बीच से हो रही हो, जायज नहीं है।
यह जानना कि तिलावत की शुरुआत के संदर्भ में कौन से तरीके जायज हैं, हमें कुरान पाठ के दौरान व्याकरणिक और अर्थ संबंधी शुद्धता बनाए रखने में मदद करता है।
सूरतुल बकरा की शुरुआत में 'अऊजु बिल्लाह मिनश शैतानिर्रजीम बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम' पढ़ना जायज है, लेकिन सूरत के बीच से शुरू करते हुए 'अऊजु बिल्लाह मिनश शैतानिर्रजीम बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम व जन्नत अलफाफा' पढ़ना नाजायज है।
  • जब तिलावत जारी हो और एक सूरत खत्म होकर दूसरी शुरू हो रही हो (जैसे सूरह नास के बाद सूरह फलक), तो तीन तरीके जायज हैं और एक नाजायज।
  • जायज तरीके हैं: फसले कुल (सबको अलग पढ़ना), वसले अव्वल (ता'आवुज़ और तस्मिया मिलाकर, सूरत को अलग पढ़ना), और फसले सानी (ता'आवुज़ अलग, तस्मिया और सूरत मिलाकर पढ़ना)।
  • नाजायज तरीका है: वसले अव्वल/फसले सानी का वो रूप जिसमें पिछली सूरत के अंत को तस्मिया से मिलाया जाता है।
  • यह नाजायज है क्योंकि इससे यह स्पष्ट नहीं होता कि बिस्मिल्लाह पिछली सूरत का हिस्सा है या अगली का।
तिलावत के दौरान सूरत बदलते समय सही नियमों का पालन करना कुरान के प्रवाह और अर्थ को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
सूरह नास खत्म होने के बाद, 'मिनल जिन्नति वनास' को सीधे 'बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम' से जोड़कर पढ़ना (वस्ल) नाजायज है, जबकि 'मिनल जिन्नति वनास' के बाद रुककर 'बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम' पढ़ना जायज है।
  • सूरतुल तौबा को शुरू करते समय न तो 'ता'आवुज़' (अऊजु बिल्लाह) पढ़ा जाता है और न ही 'तस्मिया' (बिस्मिल्लाह)।
  • यह नियम तब लागू होता है जब सूरतुल तौबा से तिलावत शुरू की जाए, या सूरतुल अनफाल के बाद सूरतुल तौबा पर जाया जाए।
  • 'ता'आवुज़' को 'इस्तियाज़ा' भी कहा जाता है, और 'तस्मिया' को 'बस्मला' भी कहा जाता है।
  • यदि बुलंद आवाज में तिलावत की जा रही है, तो ता'आवुज़ और तस्मिया भी बुलंद आवाज में पढ़े जाने चाहिए; यदि आहिस्ता आवाज में, तो आहिस्ता।
सूरतुल तौबा के विशेष नियम को जानना और 'ता'आवुज़' व 'तस्मिया' के अन्य नामों को समझना कुरान पाठ की पूर्णता और सटीकता सुनिश्चित करता है।
सूरह अनफाल के बाद जब सूरतुल तौबा शुरू करनी हो, तो सीधे 'अलिफ लाम मीम' (या आयत) से शुरू करना, बिस्मिल्लाह के बिना।

Key takeaways

  1. 1कुरान की तिलावत में गलतियां (उयूब-ए-तिलावत) अर्थ को बदल सकती हैं और उन्हें 'लहने जल्ली' कहा जाता है, जो कबीरा गुनाह का कारण बन सकती हैं।
  2. 2मद, साकिन हुरूफ, हुरूफ की अदायगी और इद्गाम के नियमों का सही पालन करना तिलावत की शुद्धता के लिए आवश्यक है।
  3. 3कुरान की तिलावत शुरू करने के चार तरीके हैं, और उनकी जायज़ता इस बात पर निर्भर करती है कि आप सूरत की शुरुआत कर रहे हैं या बीच से।
  4. 4सूरत के बीच से तिलावत शुरू करते समय, बिस्मिल्लाह को पिछली या अगली सूरत से मिलाना नाजायज है।
  5. 5सूरतुल तौबा को तिलावत में शुरू करते समय बिस्मिल्लाह के बिना पढ़ा जाता है, चाहे वह कुरान की शुरुआत हो या बीच से।
  6. 6ता'आवुज़ को इस्तियाज़ा और तस्मिया को बस्मला भी कहा जाता है, और इन नामों को जानना महत्वपूर्ण है।
  7. 7तिलावत की आवाज (बुलंद या आहिस्ता) के अनुसार ता'आवुज़ और तस्मिया की आवाज भी तय होती है।

Key terms

उयूब-ए-तिलावत (Uyoob-e-Tilawat)लहने जल्ली (Lahn-e-Jalli)मद-ए-असली (Madd-e-Asli)साकिन हुरूफ (Saakin Huroof)इद्गाम (Idghaam)तरीके-ए-तिलावत (Tareeqe-e-Tilawat)ता'आवुज़ (Ta'awuz)तस्मिया (Tasmiya)वस्ल (Wasl)फसल (Fasl)वस्ले कुल (Wasl-e-Kul)फसले कुल (Fasl-e-Kul)वस्ले अव्वल (Wasl-e-Awwal)फसले सानी (Fasl-e-Sani)इस्तियाज़ा (Istiaza)बस्मला (Basmala)सूरतुल तौबा (Surah Toba)

Test your understanding

  1. 1तिलावत में 'लहने जल्ली' किसे कहते हैं और यह अर्थ को कैसे प्रभावित कर सकती है?
  2. 2साकिन हुरूफ को हरकत देकर पढ़ने से तिलावत में क्या ऐब पैदा होता है?
  3. 3कुरान की तिलावत शुरू करने के चार तरीकों के नाम बताएं और समझाएं कि सूरत की शुरुआत में कौन से जायज हैं?
  4. 4अगर कोई व्यक्ति सूरत के बीच से तिलावत शुरू कर रहा है, तो उसे बिस्मिल्लाह के संबंध में किन नियमों का पालन करना चाहिए?
  5. 5सूरतुल तौबा को तिलावत में शुरू करते समय बिस्मिल्लाह क्यों नहीं पढ़ा जाता है?

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