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Nationalism in INDIA | 10 Minutes Rapid Revision | Class 10 SST
Digraj Singh Rajput
Overview
यह वीडियो भारत में राष्ट्रवाद के उदय पर एक विस्तृत पुनरीक्षण प्रस्तुत करता है, विशेष रूप से 1915 के बाद महात्मा गांधी के आगमन से लेकर सविनय अवज्ञा आंदोलन तक। यह प्रथम विश्व युद्ध के बाद की आर्थिक कठिनाइयों, रॉलेट एक्ट जैसे दमनकारी कानूनों और जलियांवाला बाग नरसंहार जैसी घटनाओं पर प्रकाश डालता है, जिसने लोगों को एकजुट किया। वीडियो असहयोग आंदोलन और सविनय अवज्ञा आंदोलन के विकास, विभिन्न सामाजिक समूहों की भागीदारी, उनकी सीमाओं और सांस्कृतिक प्रतीकों की भूमिका पर भी चर्चा करता है, जिसने सामूहिक अपनेपन की भावना को बढ़ावा दिया।
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Chapters
- प्रथम विश्व युद्ध के कारण भारत में करों में वृद्धि, कीमतों में वृद्धि और जबरन भर्ती हुई, जिससे जनता में असंतोष बढ़ा।
- महात्मा गांधी 1915 में दक्षिण अफ्रीका से लौटे और सत्य और अहिंसा पर आधारित सत्याग्रह का सिद्धांत लाए।
- गांधीजी ने चंपारण (1917), खेड़ा (1917), और अहमदाबाद (1918) में सफल सत्याग्रह किए, जिससे उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।
यह खंड बताता है कि कैसे प्रथम विश्व युद्ध की कठिनाइयों और गांधीजी के अहिंसक प्रतिरोध के सिद्धांतों ने भारत में बड़े पैमाने पर राष्ट्रीय आंदोलन के लिए मंच तैयार किया।
चंपारण में किसानों के लिए सत्याग्रह, खेड़ा में फसल खराब होने पर लगान माफी के लिए आंदोलन, और अहमदाबाद में कपड़ा मिल मजदूरों के लिए हड़ताल।
- रॉलेट एक्ट (1919) ने ब्रिटिश सरकार को बिना मुकदमे के किसी भी राष्ट्रवादी को गिरफ्तार करने की शक्ति दी, जिसे 'काला कानून' कहा गया।
- इसके विरोध में राष्ट्रव्यापी शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों का आह्वान किया गया, लेकिन पुलिस फायरिंग और मार्शल लॉ ने स्थिति को बिगाड़ दिया।
- जलियांवाला बाग नरसंहार (13 अप्रैल, 1919) में जनरल डायर के आदेश पर निहत्थे लोगों पर गोलीबारी की गई, जिससे व्यापक आक्रोश फैल गया।
ये घटनाएं ब्रिटिश सरकार की क्रूरता को उजागर करती हैं और भारतीयों को एकजुट करती हैं, जिससे अहिंसक प्रतिरोध के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और मजबूत होती है।
जलियांवाला बाग में बैसाखी के दिन शांतिपूर्ण सभा पर जनरल डायर द्वारा अंधाधुंध गोलीबारी।
- गांधीजी ने खिलाफत मुद्दे को जोड़कर एक व्यापक आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव रखा, जिसमें ब्रिटिश सरकार के साथ सहयोग न करने का आह्वान किया गया।
- आंदोलन में सरकारी उपाधियों को लौटाना, अदालतों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार शामिल था।
- शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भागीदारी अलग-अलग थी; शहरों में बहिष्कार प्रभावी था, जबकि गांवों में जमींदारों के खिलाफ आंदोलन और आदिवासी क्षेत्रों में वन कानूनों का विरोध देखा गया।
- चौरी-चौरा की हिंसक घटना (1922) के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया।
यह आंदोलन पहली बार बड़े पैमाने पर भारतीयों को राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल करने में सफल रहा, हालांकि इसकी अपनी सीमाएं और अंततः हिंसक घटनाओं के कारण वापसी भी हुई।
शहरों में वकीलों द्वारा अदालतों का बहिष्कार, विदेशी कपड़ों का बहिष्कार, और गांवों में जमींदारों के खिलाफ 'नाई-धोबी बंद'।
- 1920 के दशक में स्वराज पार्टी का गठन और साइमन कमीशन का विरोध (1928) जैसे घटनाक्रम हुए।
- पूर्ण स्वराज की मांग (1929) के बाद, गांधीजी ने नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च, 1930) के साथ सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया।
- इस आंदोलन में नमक कानून तोड़ना, चौकीदारी टैक्स का भुगतान न करना और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार जैसे कार्य शामिल थे।
- आंदोलन में विभिन्न समूहों जैसे अमीर किसानों, औद्योगिक मालिकों और महिलाओं ने भाग लिया, लेकिन श्रमिकों और दलितों की भागीदारी सीमित थी।
- गांधी-इरविन पैक्ट (1931) और द्वितीय गोलमेज सम्मेलन के बाद आंदोलन को वापस ले लिया गया।
यह आंदोलन ब्रिटिश शासन को चुनौती देने का एक और महत्वपूर्ण प्रयास था, जिसने विभिन्न सामाजिक वर्गों को राष्ट्रीय संघर्ष में शामिल किया और पूर्ण स्वतंत्रता की मांग को मजबूत किया।
गांधीजी का साबरमती से डांडी तक 240 मील का नमक मार्च, जहां उन्होंने समुद्र के पानी से नमक बनाकर नमक कानून तोड़ा।
- राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने में लोक कथाओं, गीतों, कविताओं और इतिहास जैसी सांस्कृतिक प्रक्रियाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का 'वंदे मातरम' और अवनींद्रनाथ टैगोर की 'भारत माता' की पेंटिंग ने राष्ट्रीय भावना को जगाया।
- स्वदेशी आंदोलन और असहयोग आंदोलन के दौरान झंडों का इस्तेमाल सामूहिक अपनेपन की भावना को विकसित करने में सहायक हुआ।
- इतिहास को फिर से व्याख्यायित किया गया ताकि भारतीयों को उनके गौरवशाली अतीत की याद दिलाई जा सके और ब्रिटिश दावों को चुनौती दी जा सके।
यह खंड बताता है कि कैसे राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक आंदोलनों तक सीमित नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों के माध्यम से लोगों के दिलों और दिमागों में भी गहराई से समाया हुआ था।
रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लोक संस्कृति को बढ़ावा देना और लोक कथाओं का संग्रह।
Key takeaways
- भारत में राष्ट्रीय आंदोलन ब्रिटिश शासन के प्रति असंतोष और महात्मा गांधी के अहिंसक नेतृत्व के संयोजन से विकसित हुआ।
- असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन जैसे बड़े पैमाने के आंदोलनों ने विभिन्न सामाजिक समूहों को राष्ट्रीय संघर्ष में शामिल किया, हालांकि उनकी अपनी सीमाएं थीं।
- सांस्कृतिक प्रतीकों, जैसे कि राष्ट्रगान, राष्ट्रीय चित्र और झंडे, ने लोगों में एकता और अपनेपन की भावना पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- विभिन्न सामाजिक और धार्मिक समूहों के बीच मतभेद और ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियां राष्ट्रीय आंदोलन की प्रगति में बाधाएं थीं।
- राष्ट्रवाद का विकास केवल राजनीतिक घटनाओं का परिणाम नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक पुनरुद्धार और सामूहिक पहचान के निर्माण से भी गहराई से जुड़ा हुआ था।
Key terms
NationalismSatyagrahaNon-Cooperation MovementCivil Disobedience MovementRowlatt ActJallianwala Bagh MassacreGandhi-Irwin PactPurna SwarajSalt MarchKhilafat Issue
Test your understanding
- महात्मा गांधी ने सत्याग्रह के सिद्धांत को भारत में कैसे लागू किया और इसके क्या परिणाम हुए?
- रॉलेट एक्ट और जलियांवाला बाग नरसंहार ने भारतीय राष्ट्रवाद को कैसे प्रभावित किया?
- असहयोग आंदोलन की मुख्य विशेषताएं क्या थीं और इसके विभिन्न सामाजिक समूहों पर क्या प्रभाव पड़ा?
- सविनय अवज्ञा आंदोलन को नमक सत्याग्रह से क्यों जोड़ा गया और इसमें किन समूहों ने भाग लिया?
- राष्ट्रवाद के विकास में सांस्कृतिक प्रतीकों और लोक संस्कृति की क्या भूमिका थी?