
Lecture 14 | Sem 6 | Has India De-industrialised Prematurely ? | Unit 2 | Part 1 | Indian Economy
Poonam Kumari
Overview
यह वीडियो भारत में 'समय से पहले डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन' की अवधारणा पर चर्चा करता है। यह बताता है कि कैसे विकसित देशों में डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन विकासशील देशों में इसका समय से पहले होना आर्थिक विकास के लिए हानिकारक हो सकता है। वीडियो राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर डेटा का विश्लेषण करके भारत की स्थिति की जांच करता है, जिसमें विनिर्माण क्षेत्र के आउटपुट और रोजगार के रुझानों पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यह निष्कर्ष निकालता है कि भारत में विनिर्माण क्षेत्र का आउटपुट स्थिर रहा है या कुछ राज्यों में गिरा है, जबकि रोजगार में वृद्धि हुई है, जो संभावित रूप से उत्पादकता में कमी का संकेत देता है।
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Chapters
- डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन का मतलब है जीडीपी और रोजगार में विनिर्माण क्षेत्र के हिस्से में गिरावट।
- यह विकसित अर्थव्यवस्थाओं में एक स्वाभाविक प्रक्रिया है क्योंकि अर्थव्यवस्थाएं परिपक्व होती हैं और सेवा क्षेत्र की ओर बढ़ती हैं।
- समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह प्रक्रिया विकासशील देशों में समय से पहले होती है, जिससे आर्थिक विकास बाधित होता है।
- विकासशील देशों में समय से पहले डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन से औद्योगिक विकास रुक सकता है और रोजगार सृजन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
- वैश्वीकरण और व्यापार के उदारीकरण के कारण विकासशील देशों को विकसित देशों से आयात प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।
- इससे आयात प्रतिस्थापन (import substitution) की रणनीतियों का उलटाव हो सकता है और घरेलू उद्योगों को नुकसान हो सकता है।
- राष्ट्रीय स्तर पर, 1991 के बाद से जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा लगभग स्थिर रहा है (लगभग 15%)।
- कुल रोजगार में विनिर्माण क्षेत्र का हिस्सा भी लगभग स्थिर रहा है (लगभग 10-12%)।
- हालांकि, कुल 'उद्योग' (जिसमें निर्माण शामिल है) के रोजगार में वृद्धि देखी गई है, जो मुख्य रूप से निर्माण क्षेत्र में वृद्धि के कारण है, न कि विनिर्माण में।
- अधिकांश राज्यों में, जीडीपी में विनिर्माण क्षेत्र के हिस्से में गिरावट देखी गई है, जो समय से पहले डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन का संकेत देता है।
- इसके विपरीत, कई राज्यों में विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार का हिस्सा या तो स्थिर रहा है या बढ़ा है।
- गुजरात और पंजाब जैसे कुछ राज्यों ने विनिर्माण के आउटपुट शेयर में वृद्धि देखी है, जबकि अन्य राज्यों में यह गिरा है।
- राज्य स्तर पर आउटपुट में गिरावट और रोजगार में वृद्धि उत्पादकता में संभावित कमी का संकेत दे सकती है।
- अगले चरण में जिला-स्तरीय डेटा का विश्लेषण किया जाएगा, विशेष रूप से रोजगार पर ध्यान केंद्रित करते हुए।
- मुख्य प्रश्न यह है कि क्या भारत ने समय से पहले डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन का अनुभव किया है, और 1991 के सुधारों के बाद इसका विकास पथ क्या रहा है।
Key takeaways
- डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन विकसित देशों के लिए एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन विकासशील देशों के लिए समय से पहले डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन आर्थिक विकास के लिए हानिकारक हो सकता है।
- वैश्विक व्यापार और प्रतिस्पर्धा विकासशील देशों में घरेलू विनिर्माण उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां पेश कर सकती है।
- भारत में राष्ट्रीय स्तर पर विनिर्माण का जीडीपी शेयर स्थिर रहा है, लेकिन राज्य स्तर पर कई राज्यों में इसमें गिरावट देखी गई है।
- जबकि कुछ राज्यों में विनिर्माण आउटपुट गिरा है, रोजगार में वृद्धि हुई है, जो संभावित रूप से उत्पादकता में कमी का संकेत देता है।
- भारत का सेवा क्षेत्र, विशेष रूप से आईटी, हाल के दशकों में आर्थिक विकास का एक प्रमुख चालक रहा है, लेकिन यह विनिर्माण की तरह रोजगार सृजित नहीं करता है।
- समय से पहले डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन से बचने के लिए विनिर्माण क्षेत्र को बढ़ावा देने वाली सरकारी नीतियों (जैसे 'मेक इन इंडिया') का उद्देश्य जीडीपी में हिस्सेदारी बढ़ाना और रोजगार सृजित करना है।
Key terms
Test your understanding
- डी-इंडस्ट्रियलाइजेशन को एक विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए समय से पहले समस्या क्यों माना जाता है?
- वैश्वीकरण और व्यापार उदारीकरण विकासशील देशों में विनिर्माण क्षेत्र को कैसे प्रभावित कर सकते हैं?
- राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर भारत में विनिर्माण क्षेत्र के आउटपुट और रोजगार के रुझानों के बीच क्या अंतर देखा गया है?
- विनिर्माण क्षेत्र में आउटपुट के स्थिर रहने या घटने के बावजूद रोजगार में वृद्धि के क्या संभावित निहितार्थ हो सकते हैं?
- भारत के आर्थिक विकास पथ में सेवा क्षेत्र की भूमिका और विनिर्माण क्षेत्र की तुलना में इसके रोजगार सृजन क्षमता के बारे में बताएं।