Exchange Rate Policy in India|| UGC NET ECONOMICS|| M.A. Economics||
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Exchange Rate Policy in India|| UGC NET ECONOMICS|| M.A. Economics||

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4 chapters5 takeaways10 key terms4 questions

Overview

यह वीडियो भारत में विनिमय दर (exchange rate) नीतियों के ऐतिहासिक विकास पर केंद्रित है। इसमें स्वतंत्रता के बाद से भारत की विनिमय दर प्रणालियों में हुए बदलावों को समझाया गया है, जिसमें निश्चित विनिमय दर प्रणाली से लेकर वर्तमान बाजार-निर्धारित प्रणाली तक का सफर शामिल है। वीडियो ब्रेटन वुड्स प्रणाली, रुपये के अवमूल्यन, भुगतान संतुलन संकट और उदारीकरण के प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण पड़ावों पर प्रकाश डालता है।

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Chapters

  • विनिमय दर एक देश की मुद्रा का दूसरे देश की मुद्रा के संदर्भ में मूल्य है।
  • यह अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और देश की आर्थिक स्थिति को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
  • विनिमय दर के दो मुख्य सिस्टम हैं: निश्चित (fixed) और लचीली (flexible)।
विनिमय दर को समझना अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और आर्थिक संबंधों के लिए मौलिक है, क्योंकि यह सीधे तौर पर आयात और निर्यात की लागत को प्रभावित करती है।
उदाहरण के लिए, यदि 1 डॉलर = 70 रुपये है, तो यह डॉलर के मुकाबले रुपये की विनिमय दर है।
  • स्वतंत्रता के बाद भारत ने निश्चित विनिमय दर प्रणाली अपनाई, जो ब्रेटन वुड्स प्रणाली का हिस्सा थी।
  • इस प्रणाली में, मुद्रा का मूल्य सोने या अमेरिकी डॉलर के संदर्भ में तय किया जाता था।
  • 1966 में, भारत को बजट घाटे और युद्धों के कारण रुपये का अवमूल्यन (devaluation) करना पड़ा।
  • यह प्रणाली 1971 में ब्रेटन वुड्स प्रणाली के टूटने तक जारी रही।
यह अवधि भारत की विनिमय दर नीति की नींव रखती है और दर्शाती है कि कैसे वैश्विक आर्थिक व्यवस्थाएं राष्ट्रीय नीतियों को प्रभावित करती हैं।
1966 में, भारत ने रुपये के मूल्य को डॉलर के मुकाबले कम किया, जिससे निर्यात सस्ता और आयात महंगा हो गया।
  • 1971 में ब्रेटन वुड्स प्रणाली के टूटने के बाद, भारत ने रुपये को ब्रिटिश पाउंड स्टर्लिंग से जोड़ा।
  • एकल मुद्रा से जुड़ाव अस्थिरता पैदा कर सकता था, इसलिए 1975 के बाद रुपये को मुद्रा की एक टोकरी (basket of currencies) से जोड़ा गया।
  • 1991 में भारत ने गंभीर भुगतान संतुलन (Balance of Payments - BOP) संकट का सामना किया, जिसके कारण विदेशी मुद्रा भंडार बहुत कम हो गया।
  • इस संकट ने आर्थिक उदारीकरण की आवश्यकता को जन्म दिया।
यह चरण दर्शाता है कि कैसे वैश्विक झटकों (जैसे तेल संकट) और आंतरिक आर्थिक दबावों ने भारत को अपनी विनिमय दर प्रबंधन रणनीति को अनुकूलित करने के लिए मजबूर किया।
1991 के BOP संकट के दौरान, भारत के पास एक महीने का आयात करने के लिए भी पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार नहीं था, जिससे IMF से ऋण लेना पड़ा।
  • 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद, भारत ने 1992 में 'लिबरलाइज्ड एक्सचेंज रेट मैनेजमेंट सिस्टम' (LERMS) पेश किया।
  • LERMS ने रुपये को आंशिक रूप से परिवर्तनीय (partially convertible) बनाया, जिसमें एक निश्चित और एक बाजार-निर्धारित दर का मिश्रण था (60:40 अनुपात)।
  • 1993 में, 60:40 प्रणाली को समाप्त कर दिया गया और रुपये को पूरी तरह से बाजार-निर्धारित विनिमय दर प्रणाली में लाया गया।
  • 1994 में, चालू खाते (Current Account) को पूरी तरह से परिवर्तनीय बना दिया गया, जबकि पूंजी खाते (Capital Account) को आंशिक परिवर्तनीय रखा गया।
यह प्रणाली भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एकीकृत करती है, जिससे व्यापार और निवेश को बढ़ावा मिलता है, साथ ही घरेलू बाजार को बाहरी झटकों से बचाने के उपाय भी शामिल हैं।
1994 में चालू खाते को पूरी तरह से परिवर्तनीय बनाने का मतलब था कि व्यापार, यात्रा और प्रेषण (remittances) जैसे उद्देश्यों के लिए रुपये को आसानी से अन्य मुद्राओं में बदला जा सकता है।

Key takeaways

  1. 1भारत की विनिमय दर नीति स्वतंत्रता के बाद से निश्चित प्रणाली से बाजार-निर्धारित प्रणाली की ओर विकसित हुई है।
  2. 2वैश्विक आर्थिक घटनाएं और घरेलू आर्थिक संकट (जैसे BOP संकट) विनिमय दर नीतियों में बदलाव के प्रमुख चालक रहे हैं।
  3. 3मुद्रा का अवमूल्यन और पुनर्मूल्यांकन (revaluation) आर्थिक संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण उपकरण रहे हैं।
  4. 4पूंजी खाते की तुलना में चालू खाते को पूरी तरह से परिवर्तनीय बनाना घरेलू अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने के लिए एक विवेकपूर्ण कदम है।
  5. 5विनिमय दर प्रबंधन का उद्देश्य अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सुविधाजनक बनाना और देश की आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करना है।

Key terms

Exchange RateFixed Exchange Rate SystemFlexible Exchange Rate SystemDevaluationBretton Woods SystemBalance of Payments (BOP) CrisisLiberalizationConvertibilityCurrent AccountCapital Account

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  1. 1भारत ने 1971 में ब्रेटन वुड्स प्रणाली के टूटने के बाद अपनी विनिमय दर प्रणाली को कैसे समायोजित किया?
  2. 21991 के भुगतान संतुलन संकट ने भारत की विनिमय दर नीति को कैसे प्रभावित किया?
  3. 3चालू खाते (Current Account) और पूंजी खाते (Capital Account) की परिवर्तनीयता (convertibility) में क्या अंतर है और भारत ने इन्हें अलग-अलग क्यों प्रबंधित किया?
  4. 4निश्चित विनिमय दर प्रणाली से बाजार-निर्धारित प्रणाली में संक्रमण के मुख्य कारण क्या थे?

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